Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 93
इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त बानबेवाँ सर्ग पूर्वोक्त स्थितिविशेषों मे यत्न के गौरव ओर लाघव का तथा वासना आदि के प्रक्षयपूर्वक ज्ञान के सहाभ्यास का वर्णन |
143 verse-groups
- Verse 1श्रीरामजी ने कहा : मान्यतम, आपने ये जो पूर्वोक्त जीवसृष्टि-लता के बीज बतलाये, उनमें से कि…
- Verse 2श्रीरामजी के इस प्रश्न पर महाराज वसिष्ठजी पहले अर्थ के अनुसार उत्तर देते हैँ । महाराज वसि…
- Verses 3–4शोधित त्वंपदार्थं का अभेद होने के कारण अखण्ड एकरसरूप पद में यदि आप बलपूर्वक वासना का परित…
- Verse 5यदि वैसी स्थिति बनाने की शक्ति न हो, तो भी कहते है । हे प्रिय श्रीरामजी, अथवा यदि सत्तासा…
- Verse 6हे अघशून्य श्रीरामजी, शोधित त्वंपदार्थरूप संवित्-तत्त्व में ध्यानसम्पन्न होकर यदि स्थित…
- Verse 7यदि शका हो कि शोधन से संवित्-अश का त्याग होने पर एकमात्र सवेद्यांश का ध्यान भी उपाय क्यो…
- Verse 8चिन्तन, चिन्तनीय आदि जो पदार्थ हैं, उस सबकी सिद्धि सवित् के अधीन है यह दिखलाते है । हे श…
- Verse 9अन्य उपाय भी कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप यदि वासना के परित्याग में प्रयत्न करते हैं,…
- Verse 10क्या यह उपाय पहले बतलाए गये उपायों से सरल है ? नहीं” यह कहते हैं । श्रीरामजी, पूर्व में प…
- Verse 11असौकर्य का उपपादन करने के लिए परस्यराधीनत्व का उपपादन करते है । जब तक मन नष्ट नहीं होता,…
- Verse 12इसी प्रकार इन की तत्वज्ञान के साथ भी परस्पराश्रयता है, यह कहते हैं । जब तक तत्त्वज्ञान नह…
- Verse 13जब तक वासना का नाश नहीं होता, तब तक तत्त्वज्ञान नहीं होता जब तक वासना का नाश नहीं होता, त…
- Verse 14तत्त्वज्ञान, मनोनाश ओर वासनाक्षय ये तीनों की एक दूसरे के प्रति कारणभाव को प्राप्त होकर अव…
- Verse 15तब कौन ऐसा उपाय है, जिससे उनकी सिद्धि हो सके ? इस प्रश्न पर वैराग्यपूर्वक एक साथ तीनों का…
- Verse 16हे श्रीरामजी, जब तक उन तीन उपायों का साथ में भली प्रकार बार बार प्रयास न किया जाय, तब तक…
- Verse 17हे महामुने, वासनाक्षय, आत्मविज्ञान और मनोनाश इन तीनों का एक साथ दीर्घकाल तक अभ्यास जब किय…
- Verse 18श्रीरामजी, जिस प्रकार मन्त्रशास्त्रोक्त मूर्च्छा, मरण आदि प्रतिबन्धकों से प्रतिबद्ध मन्त्…
- Verse 19जैसे पारितोषिक आदि से स्वाधीन बनाकर दीर्घकाल तक तत्-तत् कार्य में प्रेरित भी सेना के वी…
- Verse 20बुद्धिमान् पुरुष के द्वारा एक साथ तत्-तत् कार्यो मेँ योजित हुए वासनाक्षय आदि संसाररूपी…
- Verse 21हे प्रिय श्रीरामजी, वासनाक्षय, आत्मविज्ञान और मनोनाश इन तीनों का एक साथ प्रयत्नपूर्वक आपक…
- Verse 22जिस प्रकार कमलनाल के उच्छेदन से बिसतन्तु टूट जाते हैं, वैसे ही भली प्रकार उन तीनों का चिर…
- Verse 23वासनाक्षय आदि तीनों का भी चिरकाल तक अभ्यास क्यो करना चाहिए ? इस पर कहते हैँ । हे श्रीरामज…
- Verse 24हे भद्र, जाते, श्रवण करते, स्पर्श करते, सूँघते, स्थित रहते, जागते, सोते सब अवस्थाओं मे उत…
- Verse 25तीनों के साथ चतुर्थ प्राणायाम का भी अभ्यास करना चाहिए, ऐसा कहते हैं । हे रामभद्र, तत्त्वज…
- Verse 26वासनाओं का भली प्रकार परित्याग करने से चित्त अचित्तरूप हो जाता है | ओर प्राणवृत्तियों का…
- Verse 27चिरकाल तक प्राणायाम के अभ्यासं से, योगाभ्यास में कुशल गुरुजी के द्वारा दी गई यानी उपदिष्ट…
- Verse 28हे श्रीरामजी, यथाभूत अर्थ के यानी त्रिकाल में बाधित न होने वाले अर्थ के साक्षात्कार से वा…
- Verse 29भद्र, केवल बाह्य विषयों मेँ आसक्ति रखनेवाले मनुष्यों का संसर्ग छोडकर या संकल्प छोडकर समय…
- Verse 30जिस प्रकार पवन-स्पन्द के शान्त हो जाने पर आकाश-तल में धूलि नहीं उडती, वैसे ही वासनारूपी ध…
- Verse 31जो प्राणवायु का व्यापार है, वही चित्तस्पन्दन हे, उसी से समस्त जगत् उस प्रकार उत्पन्न होत…
- Verse 32हे श्रीरामजी, बुद्धिमान् पुरुष को एकाग्र चित्त से एकान्त में बैठकर प्राणवायु के स्पन्दन…
- Verse 33हठयोग के अभ्यास की यदि शक्ति न रहे, तो राजयोग का अभ्यास करना चाहिए, यह कहते है। हे श्रीरा…
- Verse 34अध्यात्मविद्या ओर साधुसंगति इन दो उपायों से युक्त प्रदर्शित दो प्रकार के योगों को छोडकर अ…
- Verses 35–36उसीका दिग्दर्शन करते हैं । अध्यात्मविद्या की प्राप्ति, साधुसंगति, वासना का परित्याग और प्…
- Verse 37इन सुन्दर युक्तियों के रहते जो पुरुष हठयोग से चित्त को वशीभूत करना चाहते हैं, उनके लिए मे…
- Verse 38जो मूढ पुरुष हठयोग से चित्त का जय करने के लिए उद्योगशील रहते हैं, वे उन्मत्त नागेन्द्र को…
- Verse 39बतलाई गई इन चार युक्तियों का त्यागकर जो पुरुष चित्त या चित्त के निकटवर्ती अपने शरीर को स्…
- Verse 40सत्-शास्त्रोक््त मार्ग से भरष्ट होने के कारण उन्हें अनर्थ परम्परा ही प्राप्त होती है, च…
- Verse 41पर्वत- प्रान्तों मे फल और पत्तों का भक्षण कर रहे वे अत्यन्त मुग्धबुद्धि एवं भीरु होकर बिच…
- Verse 42जिस प्रकार गाँव में आई हुई मृगी किसी का विश्वास नहीं करती, वैसे ही उन पुरुषों की चारों ओर…
- Verse 43उनका तरंगसदृश अतिचपल मन, जल में तरंगों की नाई, भयस्थानों में ही उत्तरोत्तर जाता रहते हैं…
- Verse 44अब मोक्षरूप फल जिसका निश्चित है, उस धर्ममेघनामक (आत्मविवेक ज्ञान-प्रवाहरूप) समाधि का परित…
- Verse 45श्रीरामजी, राग आदि सैकड़ों दोषों से झुलस गये वे आत्मस्वरूप नहीं जान पाते और उनमें से कोई…
- Verse 46उत्पत्ति एवं विनाशशील, एकत्र स्थिर न रहनेवाले तथा स्वर्ग, नरक और मनुष्य के भोगविशेषों के…
- Verse 47जिस प्रकार तालाब में तरंगें आती जाती रहती हैं, वैसे ही वे इस मृत्युलोक से नरक की ओर जाते…
- Verse 48हे रघुनन्दन, इसलिए आप वर्णित हठादिरूप दुष्टबुद्धि का परित्याग कर शुद्ध संवित्ति का आश्रय…
- Verse 49इस संसार में ज्ञानी ही सुखी है, ज्ञानी ही जीवित है और ज्ञानी ही बलवान् है, इसलिए आप ज्ञा…
- Verse 50हे महात्मन्, विषयों से शून्य, अति-उत्तम, समस्त पदार्थों के हेतु तथा विकल्पों से वर्जित अ…
- Verse 1उसमें पहले थोड़े से भी विचार और मनोनिग्रह का रुचि के उत्पादन और प्रवृत्ति के द्वारा क्रमश…
- Verse 2विचार एवं चित्तनिग्रह का जन्म की सफलता में उपयोग बतलाते हैं । श्रीरामजी, यदि हृदय में पूर…
- Verse 3जिसने वैराग्यपूर्वक कुछ प्रौढ-विचार कर लिया है, उस नररत्न का तो पूर्वोक्त शम, दम आदि शुद्…
- Verse 4श्रीरामजी, भली प्रकार आत्म-विचार से युक्त तथा स्वस्वरूप परब्रह्म का अवलोकन करना ही जिसका…
- Verse 5आत्मा के यथार्थ ज्ञान से जिसकी बुद्धि परिष्कृत हो गई है, उस महात्मा को यहाँ विषय, मानसिक…
- Verse 6हिरण्यगर्भ आदि के वैभव वीतराग महात्मा को लुब्ध करने में समर्थ नहीं हैं, इसी विषय को अन्यो…
- Verse 7श्रीरामजी, भला बतलाइए कि क्या विकासरम्य रात्रि-कमलों से अपने नेत्रों का पराभव हो जायेगा,…
- Verse 8श्रीरामजी, भला बतलाइए कि गण्डस्थलों से चलायमान भ्रमरमण्डलरूप नील कमल जिनके मस्तकों में है…
- Verse 9अपने से विदारित हुए मत्त गजों के मुक्ताफलों की कान्तियों से सुशोभित हो रहे जिनके नखपंजर ह…
- Verse 10विष की अधिकता के कारण अपने आप निकलनेवाले रस के सदृश स्वयं निकलनेवाले बड़े-बड़े विष-बिन्दु…
- Verse 11जिसने चतुर्थ, पंचम आदि भूमिका प्राप्त कर ली है और जिसने ज्ञेय तत्त्व जान लिया है, ऐसा विव…
- Verse 12अतः जिनका चित्त परिपक्व नहीं हुआ है, वे पहले की भूमिकाओं में ही विघ्नो से आक्रान्त होते ह…
- Verse 13जिस प्रकार अवान्तर कल्पं के क्षोभों मे महान् धीर होकर रहनेवाले मेरु आदि पर्वतो का उच्चाट…
- Verse 14श्रीरामजी, जिसने दृढ़मूल ग्रहण नहीं किया है, ऐसे विचाररूपी पुष्प वृक्ष को चिन्तारूपी झंझा…
- Verse 15अतएव विचार के विच्छेद काल में प्रमाद से राग आदि रूप मृत्यु से यह आक्रान्त होता है, इस आशय…
- Verse 16श्रीरामजी, इस जगत् का स्वरूप क्या होगा ? इस देह का स्वरूप क्या होगा यों निरन्तर धीरे-धीर…
- Verse 17विचार करने से फल अवश्य होता है, यह कहते है । प्रमादरूपी अन्धकार का अपहरण करनेवाले आत्मविच…
- Verse 18ज्ञान से दो फल होते हैं, यह कहते हैं । श्रीरामजी, आत्मस्वरूप के विज्ञान से समस्त दुःखों क…
- Verse 19जब ज्ञान अपनी प्रकाशरूपता प्राप्त कर लेता है, तब ज्ञेय ब्रह्म का पूर्ण रूप से उदय उस प्रक…
- Verse 20ज्ञान का स्वरूप बतलाते हैं। श्रीरामजी, जिस शास्त्रसम्बन्धी विचार से ब्रह्मस्वरूप अवगत हो…
- Verse 21हे भद्र, पण्डित लोग आत्मविचार से उत्पन्न आत्मविज्ञान को ही ज्ञान कहते हैं । उसी ज्ञान के…
- Verse 22सदा मदप्रचुर रहता है, वैसे सम्यक् ज्ञानरूपी सुंदर प्रकाश से युक्त पुरुष स्वयं अनुभूयमान…
- Verse 23जिसका स्वरूप सैन्धव घन की नाई एकरस है, ऐसा निर्मल पर ब्रह्म ही ज्ञेय कहा जाता है । वह ज्ञ…
- Verse 24ज्ञानसम्पन्न तथा आनन्द प्राप्त विद्वान् किसी भी विषय में लिप्त नहीं होता । समस्त संगो से…
- Verses 25–29रागीजनो द्वारा स्पृहणीय भावो में उस विद्वान की अनासक्ति वतलाते है। श्रीरामजी, जो तत्त्वज्…
- Verses 30–31भद्र, आसक्तिवर्जित ज्ञानी पुरुष कोमल कदली के स्तम्भं की पल्लवपंक्तियों से युक्त तथा देवता…
- Verses 32–34ज्ञानवान् पुरुष पिण्डखजूर (एक प्रकार की खजूर) कदम्ब, कटहल, द्राक्ष, खरबूजा, अखरोट, बिम्ब…
- Verses 35–39श्रीरामजी जो ज्ञानी श्रीमान् महात्मा है, वह यमराज, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य और वायु…
- Verses 40–43जो समबुद्धि, प्रिय, अप्रिय सब स्थानों मे समदृष्टि रखनेवाला तथा अप्रिय में क्षोभशून्य ज्ञा…
- Verse 44इसी प्रकार भयजन्य ध्वनियों में उसको भय नहीं होता, ऐसा कहते है । गड़गड़ाहट ध्वनि से युक्त…
- Verse 45शत्रुओं के नगारे आदि के शब्दों से, डमरू के शब्द से, कर्ण कटु धनुष के टंकार से ज्ञानी तनिक…
- Verse 46मदोन्मत्त हाथियों के चिंघाड़ने के शब्द, वेतालों की कलह आदि ध्वनि तथा पिशाच एवं राक्षसों क…
- Verse 47जो परब्रह्म में ध्यान लगानेवाला विद्वान् है, वह वज के भयावह शब्द से, पर्वत के विस्फोट से…
- Verse 48ज्ञानी पुरुष चल रहे आरे के घर्षण से, चमचमाती हुई तलवार के विदलन से, बाण एवं वज के सम्पात…
- Verse 49ज्ञानी पुरुष वाटिका में आनन्द प्राप्त करता है ओर न तो खेद । एवं मरुभूमि में न खेद प्राप्त…
- Verses 50–53भस्म से रहित उज्जवल अंगारों के सदुश असह्य बालू से युक्त मरुप्रदेशों मे, पुष्पों के समूहों…
- Verses 54–55ज्ञानी पुरुष महर्षि माण्डव्य की नाई प्रारब्ध कर्मो से प्राप्त हुई अगो को संकुचित करनेवाली…
- Verse 56ज्ञानी पुरुष अपवित्र, अपथ्य, विषयुक्त, गोमय आदि मल, आद्र तथा रसवर्जित पदार्थो को खाकर भी…
- Verse 57श्रीरामजी, जिसके अन्तःकरण में किसी प्रकार की विषयासक्ति नहीं है, वह तत्त्वज्ञ तत्क्षण बुद…
- Verse 58राक्षस, पिशाच आदि में भी जीवन्मुक्त हो सकते है, इसलिए उनका भी सग्रह करने के लिए तत्साधारण…
- Verse 59तत्त्वज्ञ की शत्रु और मित्र में समद्ष्टि रहती है, ऐसा कहते है । जीवन का विनाश करनेवाला तथ…
- Verse 60ज्ञानवान् चिरस्थायी देवशरीर तथा कुछ काल तक स्थायी मर्त्य शरीर, एवं उनके भोग्य रमणीय तथा…
- Verses 61–62श्रीरामजी, अपने चित्त मेँ आसक्ति का अभाव तथा विषयस्वरूप का भलीप्रकार ज्ञान हो जाने के कार…
- Verse 63तब इन्द्रियाँ किसको निगल जाती है, इस पर कहते है । जिस प्रकार हरिण पल्लव निगल जाते हैं, वै…
- Verse 64संसारसमुद्र में बह रहे, वासनारूपी वीचियो (गतिशील तरंग) से वेष्टित अतएव निरन्तर महान् क्र…
- Verse 65लोभ आदि विकल्प भी आत्मज्ञ को विचलित नहीं करते, ऐसा कहते हैँ । जैसे जल प्रवाहो से पर्वत बह…
- Verse 66समस्त संकल्पो की सीमा के अन्तभूत परम पद में जो महानुभाव विश्रान्ति कर चुके हैं, उस प्राप्…
- Verse 67श्रीरामजी, जिन महात्माओं का चित्त परिपूर्ण आत्माकार के प्रतिफलन से विशाल हो गया है, उनकी…
- Verse 68जगत् चिन्मात्रस्वरूप है, यों जानकर ये प्रमुदितमति तथा समस्त जगत् में आन्तर प्रत्यगात्मर…
- Verse 69संविन्मात्र के परिस्पन्दनस्वरूप जगत् के पिंजडे में क्या हेय ओर क्या उपादेय हो सकता है ?…
- Verse 70हे पापशून्य श्रीरामजी, यह समस्त जगत् संवितात्मक ही है, अतः आप अन्यता-भ्रान्ति का परित्या…
- Verse 71भूतकालीन पदार्थो में किसी की इच्छा नहीं होती, अतः अज्ञानीरूपी हरिणो के द्वारा वर्तमानकाली…
- Verse 72प्रतिपादित अर्थ की सिद्धि में युक्ति बतलाते हैँ। श्रीरामजी, जिसकी आदि और अन्त में अस्तिता…
- Verse 73श्रीरामभद्र, इस उक्त अर्थ का युक्तिपूर्वक मनन से दृढ़ीकरण कर तथा “यह भावरूप है ओर यह अभाव…
- Verse 74शरीर, मन, बुद्धि तथा आसक्ति दोष से वर्जित इन्द्रियो से व्युत्थानकाल में चाहे कर्म करे या…
- Verse 75हे महाबाहो, जिस प्रकार कोई भी मनोराज्य की संपत्तियों के नष्ट होने या न होने पर, तज्जनित स…
- Verse 76आत्मा में अकर्तापन ओर अभोक्तापन का अनुभव हो जाने के कारण बुद्धि को वीतसंग बना रहा तथा शरी…
- Verse 77विषयों के साथ संसर्ग से शून्य अन्तःकरणवाला महात्मा चक्षु से विषयों को देख रहा भी उन्हें न…
- Verse 78विषयसंग से शून्य मनवाला प्राणी सुनता हुआ भी नहीं सुनता, स्पर्श करता हुआ भी स्पर्श नहीं कर…
- Verse 79यह अन्यत्रमना योगी भली प्रकार सूँघ रहा भी नहीं सूँघता, नेत्र उन्मीलित कर रहा भी उन्मीलित…
- Verse 80भद्र जिनका मन अन्यत्र चला गया है, ऐसे अपने घर में रहनेवाले मूर्ख एवं अप्रोढमति बालक, पशु…
- Verse 81इन पूर्वोक्त वाक्यो से यह निष्कर्ष निकला कि आसक्तिपूर्वक पदार्थो का अनुभव करना ही बन्धन म…
- Verse 82हे निर्मल श्रीरामजी, संगपरित्याग मोक्ष (वर्तमान देह आदि से सम्बन्ध की निवृत्ति) है, यह मह…
- Verse 83श्रीरामजी ने कहा : अखिल संशयरूपी कुहरे के लिए शरत्काल के वायुरूप हे महामुने, संग किसे कहत…
- Verse 84महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थो की प्राप्ति तथा अप्राप्ति होने पर…
- Verse 85जीवन्मुक्त स्वरूपवाले तत्त्ववेत्ताओं को पुनर्जन्म न देनेवाली हर्ष एवं विषाद दोनों से निर्…
- Verse 86रामभद्र, उस शुद्ध वासना का दूसरा नाम असंग हे, इसे आप जानिये । वह तब रहती है, जब तक अवशिष्…
- Verse 87जो जीवन्मुक्त स्वरूप से सम्पन्न नहीं है एवं जो दीन एवं मूढमति हैं, उनकी वासना हर्ष तथा वि…
- Verse 88श्रीरामजी, इसी बन्धकारक वासना का दूसरा नाम संग है, यह पुनर्जन्म प्रदान करती है, इस वासना…
- Verse 89श्रीरामजी, अपनी आत्मा में विकार पैदा करनेवाले उक्त स्वरूप के संग का त्यागकर यदि आप स्वस्थ…
- Verse 90हे राघव, यदि हर्ष, अमर्षं एवं विषाद से आप अन्यरूपता प्राप्त नहीं करेगे, तो राग, भय, और क्…
- Verse 91हे राघव, यदि दुःखों से ग्लानि नहीं करते, सुखो से फूल नहीं जाते, तो आशाओं की परवशता का परि…
- Verse 92व्यवहारो एवं सुखदुःख की अवस्थाओं में विचरण करते हुए भी आप यदि ब्रह्मैकरसता छोड़ते नहीं, त…
- Verse 93हे राघव, संवेद्य पदार्थ चित्स्वभाव ही है, ज्ञान होने पर वह यदि आपको एकरूप लक्षित होता है…
- Verse 94हे अनघ, असंगता ही बिना परिश्रम से सिद्ध हुई सुदृढ़ जीवन्मुक्त की अवस्था हे, अतःउसका अवलम्…
- Verse 95जीवन्मुक्तो के ज्ञान से सम्पन्न, मौनव्रतधारी और इन्द्रियरूपी पाशो को वश में रखनेवाला ज्ञा…
- Verse 96श्रीरामजी, भोग, विक्षेप आदि के हेतुभूत प्रचुरतर पदार्थो के सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव…
- Verse 97जो कुछ भी वर्णाश्रमानुसार परम्परा-प्राप्त अपना कर्तव्य रहता है, यह ज्ञानी उसी का क्रियाभि…
- Verse 98जिस प्रकार मन्दराचलपर्वत से मणित क्षीरप्रचुर वारिसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोडता…
- Verse 99जैसे चन्द्रमा कलाओं की वृद्धि ओर कलाओं के हास या उदय एवं अस्तमय काल में एकरूप रहते हे, वै…
- Verse 100बतलाये गये लक्षणों से युक्त जीवन्मुक्तिरूपी सुख की प्राप्ति राग, द्वेष ओर भेदवासना के विन…
- Verse 101श्रीरामजी, उक्त आत्मविचार के द्वारा प्राप्त समाधि के विलास से समस्त वासनाओं का विनाश हो ज…
- Verse 2प्रकार केवल भ्रान्तिमात्र है यह ज्ञान होता है
- Verses 3–4उसके पश्चात् उपशम प्रकरण में वर्णित युक्तियों द्वारा मैंने जगत् में उत्पन्न हुए व्यक्ति…
- Verse 5ज्ञातव्य परम ब्रह्म को पा चुके तत्त्वज्ञानी को सांसारिक व्यवहारो मे जिस प्रकार व्यवहार कर…
- Verses 6–8जगत् में जन्म पाकर बाल्यावस्था में ही (आपकी-सी छोटी अवस्था में ही) जगत् की इस वास्तविक…
- Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, सकल प्राणियों की हितावह समता से सुन्दर चेष्टावाले प्रस्तुत क्रम पर आच…
- Verse 10समता से जो अक्षय सारभूत सुख प्राप्त होता है वह न तो राज्य से प्राप्त होता है ओर न कान्ताक…
- Verses 11–12समता से सकल दुःख और उनके हेतुओ का विनाश भी सिद्ध होता है, ऐसा कहते है। हे श्रीरामचन्द्रजी…
- Verse 13प्रबुद्ध हुए स्वचित्तरूपी चन्द्रमा के निष्यन्दरूप सारभूत अमृत से भी बढ़े-चढ़े साम्य का (स…
- Verse 14साम्य का अभ्यास कर रहे जन्तु का क्रोध, लोभ आदि स्वदोष भी शान्ति, ओदार्य के रूप मेँ परिणत…
- Verse 15समतारूपी सौन्दर्यं से मनोहर पुरूष को योगशास्त्र में प्रसिद्ध मत्री, करुणा, उपेक्षा, मुदित…
- Verse 16समतारूपी गुण से सम्पन्न पुरुष सदा सकल कल्याण गुणों ओर सम्पूर्ण सम्पत्तियां से युक्त है तथ…
- Verse 17स्वकार्य और परकार्य मेँ सम (विषमता रहित) अपराधियों पर भी क्षमा करनेवाले, चिन्तामणि के समा…
- Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, सदाचार सम्पन्न सब लोगों का हित करनेवाले पूर्णरूपेण मुदित (प्रसन्न) सम…