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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 93

इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त बानबेवाँ सर्ग पूर्वोक्त स्थितिविशेषों मे यत्न के गौरव ओर लाघव का तथा वासना आदि के प्रक्षयपूर्वक ज्ञान के सहाभ्यास का वर्णन |

143 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामजी ने कहा : मान्यतम, आपने ये जो पूर्वोक्त जीवसृष्टि-लता के बीज बतलाये, उनमें से कि…
  2. Verse 2श्रीरामजी के इस प्रश्न पर महाराज वसिष्ठजी पहले अर्थ के अनुसार उत्तर देते हैँ । महाराज वसि…
  3. Verses 3–4शोधित त्वंपदार्थं का अभेद होने के कारण अखण्ड एकरसरूप पद में यदि आप बलपूर्वक वासना का परित…
  4. Verse 5यदि वैसी स्थिति बनाने की शक्ति न हो, तो भी कहते है । हे प्रिय श्रीरामजी, अथवा यदि सत्तासा…
  5. Verse 6हे अघशून्य श्रीरामजी, शोधित त्वंपदार्थरूप संवित्‌-तत्त्व में ध्यानसम्पन्न होकर यदि स्थित…
  6. Verse 7यदि शका हो कि शोधन से संवित्‌-अश का त्याग होने पर एकमात्र सवेद्यांश का ध्यान भी उपाय क्यो…
  7. Verse 8चिन्तन, चिन्तनीय आदि जो पदार्थ हैं, उस सबकी सिद्धि सवित्‌ के अधीन है यह दिखलाते है । हे श…
  8. Verse 9अन्य उपाय भी कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप यदि वासना के परित्याग में प्रयत्न करते हैं,…
  9. Verse 10क्या यह उपाय पहले बतलाए गये उपायों से सरल है ? नहीं” यह कहते हैं । श्रीरामजी, पूर्व में प…
  10. Verse 11असौकर्य का उपपादन करने के लिए परस्यराधीनत्व का उपपादन करते है । जब तक मन नष्ट नहीं होता,…
  11. Verse 12इसी प्रकार इन की तत्वज्ञान के साथ भी परस्पराश्रयता है, यह कहते हैं । जब तक तत्त्वज्ञान नह…
  12. Verse 13जब तक वासना का नाश नहीं होता, तब तक तत्त्वज्ञान नहीं होता जब तक वासना का नाश नहीं होता, त…
  13. Verse 14तत्त्वज्ञान, मनोनाश ओर वासनाक्षय ये तीनों की एक दूसरे के प्रति कारणभाव को प्राप्त होकर अव…
  14. Verse 15तब कौन ऐसा उपाय है, जिससे उनकी सिद्धि हो सके ? इस प्रश्न पर वैराग्यपूर्वक एक साथ तीनों का…
  15. Verse 16हे श्रीरामजी, जब तक उन तीन उपायों का साथ में भली प्रकार बार बार प्रयास न किया जाय, तब तक…
  16. Verse 17हे महामुने, वासनाक्षय, आत्मविज्ञान और मनोनाश इन तीनों का एक साथ दीर्घकाल तक अभ्यास जब किय…
  17. Verse 18श्रीरामजी, जिस प्रकार मन्त्रशास्त्रोक्त मूर्च्छा, मरण आदि प्रतिबन्धकों से प्रतिबद्ध मन्त्…
  18. Verse 19जैसे पारितोषिक आदि से स्वाधीन बनाकर दीर्घकाल तक तत्‌-तत्‌ कार्य में प्रेरित भी सेना के वी…
  19. Verse 20बुद्धिमान्‌ पुरुष के द्वारा एक साथ तत्‌-तत्‌ कार्यो मेँ योजित हुए वासनाक्षय आदि संसाररूपी…
  20. Verse 21हे प्रिय श्रीरामजी, वासनाक्षय, आत्मविज्ञान और मनोनाश इन तीनों का एक साथ प्रयत्नपूर्वक आपक…
  21. Verse 22जिस प्रकार कमलनाल के उच्छेदन से बिसतन्तु टूट जाते हैं, वैसे ही भली प्रकार उन तीनों का चिर…
  22. Verse 23वासनाक्षय आदि तीनों का भी चिरकाल तक अभ्यास क्यो करना चाहिए ? इस पर कहते हैँ । हे श्रीरामज…
  23. Verse 24हे भद्र, जाते, श्रवण करते, स्पर्श करते, सूँघते, स्थित रहते, जागते, सोते सब अवस्थाओं मे उत…
  24. Verse 25तीनों के साथ चतुर्थ प्राणायाम का भी अभ्यास करना चाहिए, ऐसा कहते हैं । हे रामभद्र, तत्त्वज…
  25. Verse 26वासनाओं का भली प्रकार परित्याग करने से चित्त अचित्तरूप हो जाता है | ओर प्राणवृत्तियों का…
  26. Verse 27चिरकाल तक प्राणायाम के अभ्यासं से, योगाभ्यास में कुशल गुरुजी के द्वारा दी गई यानी उपदिष्ट…
  27. Verse 28हे श्रीरामजी, यथाभूत अर्थ के यानी त्रिकाल में बाधित न होने वाले अर्थ के साक्षात्कार से वा…
  28. Verse 29भद्र, केवल बाह्य विषयों मेँ आसक्ति रखनेवाले मनुष्यों का संसर्ग छोडकर या संकल्प छोडकर समय…
  29. Verse 30जिस प्रकार पवन-स्पन्द के शान्त हो जाने पर आकाश-तल में धूलि नहीं उडती, वैसे ही वासनारूपी ध…
  30. Verse 31जो प्राणवायु का व्यापार है, वही चित्तस्पन्दन हे, उसी से समस्त जगत्‌ उस प्रकार उत्पन्न होत…
  31. Verse 32हे श्रीरामजी, बुद्धिमान्‌ पुरुष को एकाग्र चित्त से एकान्त में बैठकर प्राणवायु के स्पन्दन…
  32. Verse 33हठयोग के अभ्यास की यदि शक्ति न रहे, तो राजयोग का अभ्यास करना चाहिए, यह कहते है। हे श्रीरा…
  33. Verse 34अध्यात्मविद्या ओर साधुसंगति इन दो उपायों से युक्त प्रदर्शित दो प्रकार के योगों को छोडकर अ…
  34. Verses 35–36उसीका दिग्दर्शन करते हैं । अध्यात्मविद्या की प्राप्ति, साधुसंगति, वासना का परित्याग और प्…
  35. Verse 37इन सुन्दर युक्तियों के रहते जो पुरुष हठयोग से चित्त को वशीभूत करना चाहते हैं, उनके लिए मे…
  36. Verse 38जो मूढ पुरुष हठयोग से चित्त का जय करने के लिए उद्योगशील रहते हैं, वे उन्मत्त नागेन्द्र को…
  37. Verse 39बतलाई गई इन चार युक्तियों का त्यागकर जो पुरुष चित्त या चित्त के निकटवर्ती अपने शरीर को स्…
  38. Verse 40सत्‌-शास्त्रोक्‍्त मार्ग से भरष्ट होने के कारण उन्हें अनर्थ परम्परा ही प्राप्त होती है, च…
  39. Verse 41पर्वत- प्रान्तों मे फल और पत्तों का भक्षण कर रहे वे अत्यन्त मुग्धबुद्धि एवं भीरु होकर बिच…
  40. Verse 42जिस प्रकार गाँव में आई हुई मृगी किसी का विश्वास नहीं करती, वैसे ही उन पुरुषों की चारों ओर…
  41. Verse 43उनका तरंगसदृश अतिचपल मन, जल में तरंगों की नाई, भयस्थानों में ही उत्तरोत्तर जाता रहते हैं…
  42. Verse 44अब मोक्षरूप फल जिसका निश्चित है, उस धर्ममेघनामक (आत्मविवेक ज्ञान-प्रवाहरूप) समाधि का परित…
  43. Verse 45श्रीरामजी, राग आदि सैकड़ों दोषों से झुलस गये वे आत्मस्वरूप नहीं जान पाते और उनमें से कोई…
  44. Verse 46उत्पत्ति एवं विनाशशील, एकत्र स्थिर न रहनेवाले तथा स्वर्ग, नरक और मनुष्य के भोगविशेषों के…
  45. Verse 47जिस प्रकार तालाब में तरंगें आती जाती रहती हैं, वैसे ही वे इस मृत्युलोक से नरक की ओर जाते…
  46. Verse 48हे रघुनन्दन, इसलिए आप वर्णित हठादिरूप दुष्टबुद्धि का परित्याग कर शुद्ध संवित्ति का आश्रय…
  47. Verse 49इस संसार में ज्ञानी ही सुखी है, ज्ञानी ही जीवित है और ज्ञानी ही बलवान्‌ है, इसलिए आप ज्ञा…
  48. Verse 50हे महात्मन्‌, विषयों से शून्य, अति-उत्तम, समस्त पदार्थों के हेतु तथा विकल्पों से वर्जित अ…
  49. Verse 1उसमें पहले थोड़े से भी विचार और मनोनिग्रह का रुचि के उत्पादन और प्रवृत्ति के द्वारा क्रमश…
  50. Verse 2विचार एवं चित्तनिग्रह का जन्म की सफलता में उपयोग बतलाते हैं । श्रीरामजी, यदि हृदय में पूर…
  51. Verse 3जिसने वैराग्यपूर्वक कुछ प्रौढ-विचार कर लिया है, उस नररत्न का तो पूर्वोक्त शम, दम आदि शुद्…
  52. Verse 4श्रीरामजी, भली प्रकार आत्म-विचार से युक्त तथा स्वस्वरूप परब्रह्म का अवलोकन करना ही जिसका…
  53. Verse 5आत्मा के यथार्थ ज्ञान से जिसकी बुद्धि परिष्कृत हो गई है, उस महात्मा को यहाँ विषय, मानसिक…
  54. Verse 6हिरण्यगर्भ आदि के वैभव वीतराग महात्मा को लुब्ध करने में समर्थ नहीं हैं, इसी विषय को अन्यो…
  55. Verse 7श्रीरामजी, भला बतलाइए कि क्या विकासरम्य रात्रि-कमलों से अपने नेत्रों का पराभव हो जायेगा,…
  56. Verse 8श्रीरामजी, भला बतलाइए कि गण्डस्थलों से चलायमान भ्रमरमण्डलरूप नील कमल जिनके मस्तकों में है…
  57. Verse 9अपने से विदारित हुए मत्त गजों के मुक्ताफलों की कान्तियों से सुशोभित हो रहे जिनके नखपंजर ह…
  58. Verse 10विष की अधिकता के कारण अपने आप निकलनेवाले रस के सदृश स्वयं निकलनेवाले बड़े-बड़े विष-बिन्दु…
  59. Verse 11जिसने चतुर्थ, पंचम आदि भूमिका प्राप्त कर ली है और जिसने ज्ञेय तत्त्व जान लिया है, ऐसा विव…
  60. Verse 12अतः जिनका चित्त परिपक्व नहीं हुआ है, वे पहले की भूमिकाओं में ही विघ्नो से आक्रान्त होते ह…
  61. Verse 13जिस प्रकार अवान्तर कल्पं के क्षोभों मे महान्‌ धीर होकर रहनेवाले मेरु आदि पर्वतो का उच्चाट…
  62. Verse 14श्रीरामजी, जिसने दृढ़मूल ग्रहण नहीं किया है, ऐसे विचाररूपी पुष्प वृक्ष को चिन्तारूपी झंझा…
  63. Verse 15अतएव विचार के विच्छेद काल में प्रमाद से राग आदि रूप मृत्यु से यह आक्रान्त होता है, इस आशय…
  64. Verse 16श्रीरामजी, इस जगत्‌ का स्वरूप क्या होगा ? इस देह का स्वरूप क्या होगा यों निरन्तर धीरे-धीर…
  65. Verse 17विचार करने से फल अवश्य होता है, यह कहते है । प्रमादरूपी अन्धकार का अपहरण करनेवाले आत्मविच…
  66. Verse 18ज्ञान से दो फल होते हैं, यह कहते हैं । श्रीरामजी, आत्मस्वरूप के विज्ञान से समस्त दुःखों क…
  67. Verse 19जब ज्ञान अपनी प्रकाशरूपता प्राप्त कर लेता है, तब ज्ञेय ब्रह्म का पूर्ण रूप से उदय उस प्रक…
  68. Verse 20ज्ञान का स्वरूप बतलाते हैं। श्रीरामजी, जिस शास्त्रसम्बन्धी विचार से ब्रह्मस्वरूप अवगत हो…
  69. Verse 21हे भद्र, पण्डित लोग आत्मविचार से उत्पन्न आत्मविज्ञान को ही ज्ञान कहते हैं । उसी ज्ञान के…
  70. Verse 22सदा मदप्रचुर रहता है, वैसे सम्यक्‌ ज्ञानरूपी सुंदर प्रकाश से युक्त पुरुष स्वयं अनुभूयमान…
  71. Verse 23जिसका स्वरूप सैन्धव घन की नाई एकरस है, ऐसा निर्मल पर ब्रह्म ही ज्ञेय कहा जाता है । वह ज्ञ…
  72. Verse 24ज्ञानसम्पन्न तथा आनन्द प्राप्त विद्वान्‌ किसी भी विषय में लिप्त नहीं होता । समस्त संगो से…
  73. Verses 25–29रागीजनो द्वारा स्पृहणीय भावो में उस विद्वान की अनासक्ति वतलाते है। श्रीरामजी, जो तत्त्वज्…
  74. Verses 30–31भद्र, आसक्तिवर्जित ज्ञानी पुरुष कोमल कदली के स्तम्भं की पल्लवपंक्तियों से युक्त तथा देवता…
  75. Verses 32–34ज्ञानवान्‌ पुरुष पिण्डखजूर (एक प्रकार की खजूर) कदम्ब, कटहल, द्राक्ष, खरबूजा, अखरोट, बिम्ब…
  76. Verses 35–39श्रीरामजी जो ज्ञानी श्रीमान्‌ महात्मा है, वह यमराज, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य और वायु…
  77. Verses 40–43जो समबुद्धि, प्रिय, अप्रिय सब स्थानों मे समदृष्टि रखनेवाला तथा अप्रिय में क्षोभशून्य ज्ञा…
  78. Verse 44इसी प्रकार भयजन्य ध्वनियों में उसको भय नहीं होता, ऐसा कहते है । गड़गड़ाहट ध्वनि से युक्त…
  79. Verse 45शत्रुओं के नगारे आदि के शब्दों से, डमरू के शब्द से, कर्ण कटु धनुष के टंकार से ज्ञानी तनिक…
  80. Verse 46मदोन्मत्त हाथियों के चिंघाड़ने के शब्द, वेतालों की कलह आदि ध्वनि तथा पिशाच एवं राक्षसों क…
  81. Verse 47जो परब्रह्म में ध्यान लगानेवाला विद्वान्‌ है, वह वज के भयावह शब्द से, पर्वत के विस्फोट से…
  82. Verse 48ज्ञानी पुरुष चल रहे आरे के घर्षण से, चमचमाती हुई तलवार के विदलन से, बाण एवं वज के सम्पात…
  83. Verse 49ज्ञानी पुरुष वाटिका में आनन्द प्राप्त करता है ओर न तो खेद । एवं मरुभूमि में न खेद प्राप्त…
  84. Verses 50–53भस्म से रहित उज्जवल अंगारों के सदुश असह्य बालू से युक्त मरुप्रदेशों मे, पुष्पों के समूहों…
  85. Verses 54–55ज्ञानी पुरुष महर्षि माण्डव्य की नाई प्रारब्ध कर्मो से प्राप्त हुई अगो को संकुचित करनेवाली…
  86. Verse 56ज्ञानी पुरुष अपवित्र, अपथ्य, विषयुक्त, गोमय आदि मल, आद्र तथा रसवर्जित पदार्थो को खाकर भी…
  87. Verse 57श्रीरामजी, जिसके अन्तःकरण में किसी प्रकार की विषयासक्ति नहीं है, वह तत्त्वज्ञ तत्क्षण बुद…
  88. Verse 58राक्षस, पिशाच आदि में भी जीवन्मुक्त हो सकते है, इसलिए उनका भी सग्रह करने के लिए तत्साधारण…
  89. Verse 59तत्त्वज्ञ की शत्रु और मित्र में समद्ष्टि रहती है, ऐसा कहते है । जीवन का विनाश करनेवाला तथ…
  90. Verse 60ज्ञानवान्‌ चिरस्थायी देवशरीर तथा कुछ काल तक स्थायी मर्त्य शरीर, एवं उनके भोग्य रमणीय तथा…
  91. Verses 61–62श्रीरामजी, अपने चित्त मेँ आसक्ति का अभाव तथा विषयस्वरूप का भलीप्रकार ज्ञान हो जाने के कार…
  92. Verse 63तब इन्द्रियाँ किसको निगल जाती है, इस पर कहते है । जिस प्रकार हरिण पल्लव निगल जाते हैं, वै…
  93. Verse 64संसारसमुद्र में बह रहे, वासनारूपी वीचियो (गतिशील तरंग) से वेष्टित अतएव निरन्तर महान्‌ क्र…
  94. Verse 65लोभ आदि विकल्प भी आत्मज्ञ को विचलित नहीं करते, ऐसा कहते हैँ । जैसे जल प्रवाहो से पर्वत बह…
  95. Verse 66समस्त संकल्पो की सीमा के अन्तभूत परम पद में जो महानुभाव विश्रान्ति कर चुके हैं, उस प्राप्…
  96. Verse 67श्रीरामजी, जिन महात्माओं का चित्त परिपूर्ण आत्माकार के प्रतिफलन से विशाल हो गया है, उनकी…
  97. Verse 68जगत्‌ चिन्मात्रस्वरूप है, यों जानकर ये प्रमुदितमति तथा समस्त जगत्‌ में आन्तर प्रत्यगात्मर…
  98. Verse 69संविन्मात्र के परिस्पन्दनस्वरूप जगत्‌ के पिंजडे में क्या हेय ओर क्या उपादेय हो सकता है ?…
  99. Verse 70हे पापशून्य श्रीरामजी, यह समस्त जगत्‌ संवितात्मक ही है, अतः आप अन्यता-भ्रान्ति का परित्या…
  100. Verse 71भूतकालीन पदार्थो में किसी की इच्छा नहीं होती, अतः अज्ञानीरूपी हरिणो के द्वारा वर्तमानकाली…
  101. Verse 72प्रतिपादित अर्थ की सिद्धि में युक्ति बतलाते हैँ। श्रीरामजी, जिसकी आदि और अन्त में अस्तिता…
  102. Verse 73श्रीरामभद्र, इस उक्त अर्थ का युक्तिपूर्वक मनन से दृढ़ीकरण कर तथा “यह भावरूप है ओर यह अभाव…
  103. Verse 74शरीर, मन, बुद्धि तथा आसक्ति दोष से वर्जित इन्द्रियो से व्युत्थानकाल में चाहे कर्म करे या…
  104. Verse 75हे महाबाहो, जिस प्रकार कोई भी मनोराज्य की संपत्तियों के नष्ट होने या न होने पर, तज्जनित स…
  105. Verse 76आत्मा में अकर्तापन ओर अभोक्तापन का अनुभव हो जाने के कारण बुद्धि को वीतसंग बना रहा तथा शरी…
  106. Verse 77विषयों के साथ संसर्ग से शून्य अन्तःकरणवाला महात्मा चक्षु से विषयों को देख रहा भी उन्हें न…
  107. Verse 78विषयसंग से शून्य मनवाला प्राणी सुनता हुआ भी नहीं सुनता, स्पर्श करता हुआ भी स्पर्श नहीं कर…
  108. Verse 79यह अन्यत्रमना योगी भली प्रकार सूँघ रहा भी नहीं सूँघता, नेत्र उन्मीलित कर रहा भी उन्मीलित…
  109. Verse 80भद्र जिनका मन अन्यत्र चला गया है, ऐसे अपने घर में रहनेवाले मूर्ख एवं अप्रोढमति बालक, पशु…
  110. Verse 81इन पूर्वोक्त वाक्यो से यह निष्कर्ष निकला कि आसक्तिपूर्वक पदार्थो का अनुभव करना ही बन्धन म…
  111. Verse 82हे निर्मल श्रीरामजी, संगपरित्याग मोक्ष (वर्तमान देह आदि से सम्बन्ध की निवृत्ति) है, यह मह…
  112. Verse 83श्रीरामजी ने कहा : अखिल संशयरूपी कुहरे के लिए शरत्काल के वायुरूप हे महामुने, संग किसे कहत…
  113. Verse 84महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थो की प्राप्ति तथा अप्राप्ति होने पर…
  114. Verse 85जीवन्मुक्त स्वरूपवाले तत्त्ववेत्ताओं को पुनर्जन्म न देनेवाली हर्ष एवं विषाद दोनों से निर्…
  115. Verse 86रामभद्र, उस शुद्ध वासना का दूसरा नाम असंग हे, इसे आप जानिये । वह तब रहती है, जब तक अवशिष्…
  116. Verse 87जो जीवन्मुक्त स्वरूप से सम्पन्न नहीं है एवं जो दीन एवं मूढमति हैं, उनकी वासना हर्ष तथा वि…
  117. Verse 88श्रीरामजी, इसी बन्धकारक वासना का दूसरा नाम संग है, यह पुनर्जन्म प्रदान करती है, इस वासना…
  118. Verse 89श्रीरामजी, अपनी आत्मा में विकार पैदा करनेवाले उक्त स्वरूप के संग का त्यागकर यदि आप स्वस्थ…
  119. Verse 90हे राघव, यदि हर्ष, अमर्षं एवं विषाद से आप अन्यरूपता प्राप्त नहीं करेगे, तो राग, भय, और क्…
  120. Verse 91हे राघव, यदि दुःखों से ग्लानि नहीं करते, सुखो से फूल नहीं जाते, तो आशाओं की परवशता का परि…
  121. Verse 92व्यवहारो एवं सुखदुःख की अवस्थाओं में विचरण करते हुए भी आप यदि ब्रह्मैकरसता छोड़ते नहीं, त…
  122. Verse 93हे राघव, संवेद्य पदार्थ चित्स्वभाव ही है, ज्ञान होने पर वह यदि आपको एकरूप लक्षित होता है…
  123. Verse 94हे अनघ, असंगता ही बिना परिश्रम से सिद्ध हुई सुदृढ़ जीवन्मुक्त की अवस्था हे, अतःउसका अवलम्…
  124. Verse 95जीवन्मुक्तो के ज्ञान से सम्पन्न, मौनव्रतधारी और इन्द्रियरूपी पाशो को वश में रखनेवाला ज्ञा…
  125. Verse 96श्रीरामजी, भोग, विक्षेप आदि के हेतुभूत प्रचुरतर पदार्थो के सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव…
  126. Verse 97जो कुछ भी वर्णाश्रमानुसार परम्परा-प्राप्त अपना कर्तव्य रहता है, यह ज्ञानी उसी का क्रियाभि…
  127. Verse 98जिस प्रकार मन्दराचलपर्वत से मणित क्षीरप्रचुर वारिसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोडता…
  128. Verse 99जैसे चन्द्रमा कलाओं की वृद्धि ओर कलाओं के हास या उदय एवं अस्तमय काल में एकरूप रहते हे, वै…
  129. Verse 100बतलाये गये लक्षणों से युक्त जीवन्मुक्तिरूपी सुख की प्राप्ति राग, द्वेष ओर भेदवासना के विन…
  130. Verse 101श्रीरामजी, उक्त आत्मविचार के द्वारा प्राप्त समाधि के विलास से समस्त वासनाओं का विनाश हो ज…
  131. Verse 2प्रकार केवल भ्रान्तिमात्र है यह ज्ञान होता है
  132. Verses 3–4उसके पश्चात्‌ उपशम प्रकरण में वर्णित युक्तियों द्वारा मैंने जगत्‌ में उत्पन्न हुए व्यक्ति…
  133. Verse 5ज्ञातव्य परम ब्रह्म को पा चुके तत्त्वज्ञानी को सांसारिक व्यवहारो मे जिस प्रकार व्यवहार कर…
  134. Verses 6–8जगत्‌ में जन्म पाकर बाल्यावस्था में ही (आपकी-सी छोटी अवस्था में ही) जगत्‌ की इस वास्तविक…
  135. Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, सकल प्राणियों की हितावह समता से सुन्दर चेष्टावाले प्रस्तुत क्रम पर आच…
  136. Verse 10समता से जो अक्षय सारभूत सुख प्राप्त होता है वह न तो राज्य से प्राप्त होता है ओर न कान्ताक…
  137. Verses 11–12समता से सकल दुःख और उनके हेतुओ का विनाश भी सिद्ध होता है, ऐसा कहते है। हे श्रीरामचन्द्रजी…
  138. Verse 13प्रबुद्ध हुए स्वचित्तरूपी चन्द्रमा के निष्यन्दरूप सारभूत अमृत से भी बढ़े-चढ़े साम्य का (स…
  139. Verse 14साम्य का अभ्यास कर रहे जन्तु का क्रोध, लोभ आदि स्वदोष भी शान्ति, ओदार्य के रूप मेँ परिणत…
  140. Verse 15समतारूपी सौन्दर्यं से मनोहर पुरूष को योगशास्त्र में प्रसिद्ध मत्री, करुणा, उपेक्षा, मुदित…
  141. Verse 16समतारूपी गुण से सम्पन्न पुरुष सदा सकल कल्याण गुणों ओर सम्पूर्ण सम्पत्तियां से युक्त है तथ…
  142. Verse 17स्वकार्य और परकार्य मेँ सम (विषमता रहित) अपराधियों पर भी क्षमा करनेवाले, चिन्तामणि के समा…
  143. Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, सदाचार सम्पन्न सब लोगों का हित करनेवाले पूर्णरूपेण मुदित (प्रसन्न) सम…