Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verses 61–62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verses 61–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 61,62
संस्कृत श्लोक
मुक्तास्थत्वादनास्थेयरूपत्वाज्जगतः स्थितौ ।
नूनं विदितवेद्यत्वान्नीरागत्वात्स्वचेतसः ॥ ६१ ॥
न कस्यचिन्नो कदाचिदक्षस्य विषयस्थितौ ।
ददाति प्रसरं साधुराधिप्रोज्झितया धिया ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, अपने चित्त मेँ आसक्ति का अभाव तथा विषयस्वरूप का
भलीप्रकार ज्ञान हो जाने के कारण जगत की स्थिति में ज्ञानी आस्था नहीं रखता एवं मिथ्या विषय
आस्था के अयोम्यरूप होने से ज्ञानी साधु पुरुष किसी भी समय किसी इन्द्रिय को विषयप्रवृत्ति के
लिए अवसर नहीं देता, क्योकि उसकी बुद्धि समस्त मानस पीडाओं से निर्मुक्त हो चुकी है