Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
यदेतज्जायते भूमेर्भविष्यत्पल्लवाङ्कुरम् ।
तत्संविदेव प्रथते तथा तत्त्वाङ्कुरस्थितम् ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
भूतकालीन पदार्थो में किसी की इच्छा नहीं होती, अतः अज्ञानीरूपी हरिणो के द्वारा
वर्तमानकालीन जो कुछ भूमि से पल्लवांकुरप्राय पदार्थ उत्पन्न होते है और भविष्यत्कालीन जो कुछ
भूमि से पल्लवांकुररूप पदार्थ उत्पन्न होनेवाले हैं, ये ही स्पृहणी हैं, उन सबका जैसे तत्त्वज्ञ की दृष्टि
से संविद्रूप से प्रथन होता है, वैसे ही आकाशादि तत्त्वों के अंकुर की नाई स्थित शब्द, स्पर्श आदि
अन्य विषयों का भी तत्त्वज्ञ की दृष्टि से संविद्रूप से ही प्रथन होता है