Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 98
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 98 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 98
संस्कृत श्लोक
अथापदं प्राप्य सुसंपदं वा महामतिः स्वप्रकृतं स्वभावम् ।
जहाति नो मन्दरवेल्लितोऽपि शौक्ल्यं यथा क्षीरमयाम्बुराशिः ॥ ९८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस
प्रकार मन्दराचलपर्वत से मणित क्षीरप्रचुर वारिसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोडता, उस
प्रकार आपत्ति पाकर अथवा उत्तम सम्पत्ति पाकर महामति तत्त्वज्ञ अपना पूर्वसिद्ध शम, दम,
प्रसन्नता, समदर्शन आदि स्वभाव नहीं छोडता