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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

पूताङ्गारसमाकल्पसैकतेष्वपि धन्वसु । पुष्पप्रकरसंछन्नमृदुशाद्वलभूमिषु ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

हे महात्मन्‌, विषयों से शून्य, अति-उत्तम, समस्त पदार्थों के हेतु तथा विकल्पों से वर्जित अद्वितीय संवित्‌-पद की भावना करते हुए तथा चित्त के संकल्प-विकल्पों से विमुख यानी चित्त की बहिर्मुखता से शून्य होकर आप ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाइए । और व्युत्थानकाल में तो विहित कर्मों का अनुष्ठान करते हुए भी असंग एवं शम से प्राप्त हुई जीवन्मुक्त-गुण-सम्पत्ति से राजित होकर अकर्तापद की प्राप्ति करके स्थित होइए