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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

जीवितस्यापि हर्तारं दातारं चैकरूपया । दृशा प्रसादमाधुर्यशालिन्या परिपश्यति ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ की शत्रु और मित्र में समद्ष्टि रहती है, ऐसा कहते है । जीवन का विनाश करनेवाला तथा जीवन का दान देनेवाला इन दोनों पुरुषों को ज्ञानी पुरुष प्रसन्नता एवं मधुरता से शोभित दृष्टि से यानी समदृष्टि से देखता है