Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 97
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 97 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 97
संस्कृत श्लोक
यदेव किंचित्प्रकृतं क्रमस्थं कर्तव्यमात्मीयमसौ तदेव ।
संसर्गसंबन्धविहीनयैव कुर्वन्न खेदं रमते धियान्तः ॥ ९७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ भी वर्णाश्रमानुसार
परम्परा-प्राप्त अपना कर्तव्य रहता है, यह ज्ञानी उसी का क्रियाभिनिवेश ओर लाभ की अभिलाषा
से वर्जित बुद्धि से खेद छोडकर अनुष्ठान करता हुआ अपनी आत्मा मेँ रमण करता है