Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
किंचित्प्रौढविचारं तु नरं वैराग्यपूर्वकम् ।
संश्रयन्ति गुणाः शुद्धाः सरः पूर्णमिवाण्डजः ॥ ३ ॥
सम्यग्विचारिणं प्राज्ञं यथाभूतावलोकिनम् ।
आसादयन्त्यपि स्फारा नाविद्याविभवा भृशम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
शोधित त्वंपदार्थं का अभेद होने के कारण अखण्ड एकरसरूप पद में यदि आप बलपूर्वक वासना का
परित्याग कर पुरुष प्रयत्न से क्षणभर के लिए भी स्थिति-चित्त की निश्चलता बधि, तो हे तत्त्वज्ञ,
आप उसी क्षण में उक्त उत्तम पद को पूर्णरूप से प्राप्त कर ले