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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 100

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 100 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 100

संस्कृत श्लोक

निरस्तसंरम्भमपास्तभेदं प्रशान्तनानाफलवल्गुवेषम् । विचारयात्मानमदीनसत्त्वो यथा भवस्युत्तमकार्यनिष्ठः ॥ १०० ॥

हिन्दी अर्थ

बतलाये गये लक्षणों से युक्त जीवन्मुक्तिरूपी सुख की प्राप्ति राग, द्वेष ओर भेदवासना के विनाश तथा ज्ञान के अभ्यास से युक्त आत्मविचार ही उपाय है, इसलिए उसी का श्रीरामचन्द्रजी, को उपदेश दे रहे महर्षि वस्रिष्ठजी उपसंहार करते हैं । श्रीरामजी, मन में दीनता को त्याग आप क्रोध, आत्मा और अनात्मा के भेद व नानाफलक तुच्छस्वरूप कर्मो के त्यागपूर्वक आत्मा का विचार कीजिए, जिससे उत्तम कार्य निष्ठ हो जाय यानी अवश्य संपादन करने के लिए योग्य अंतिम पुरुषार्थ में स्थित हो जाय