Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 96
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 96 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 96
संस्कृत श्लोक
सदा समग्रेऽपि हि वस्तुजाले समाशयोऽप्यन्तरदीनसत्त्वः ।
व्यापारमात्रात्सहजात्क्रमस्थान्न किंचिदप्यन्यदसौ करोति ॥ ९६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, भोग, विक्षेप आदि के हेतुभूत
प्रचुरतर पदार्थो के सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव रखनेवाला तथा बाहर एवं भीतर इच्छा एवं
याचना आदि दीनता से शून्य अन्तःकरणवाला यह महात्मा एकमात्र अपने वर्णाश्रमोचित स्वाभाविक
क्रम-प्राप्त व्यापार से पृथक् दूसरा कुछ भी व्यापार नहीं करता