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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

मत्तवारणबृंहासु वेतालकलनासु च । पिशाचरक्षःक्ष्वेडासु मनागपि न कम्पते ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

उत्पत्ति एवं विनाशशील, एकत्र स्थिर न रहनेवाले तथा स्वर्ग, नरक और मनुष्य के भोगविशेषों के कारण, गेंद की नाई, निपतन और उत्पतनकारक शरीर वाले होकर वे मरण आदि से पीड़ित हो जाते हैं