Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
विचारिणं भव्यपदं विश्रान्तधियमात्मनि ।
न हरन्ति विकल्पौघा जलौघा इव पर्वतम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
लोभ आदि विकल्प भी आत्मज्ञ को विचलित नहीं करते, ऐसा कहते हैँ ।
जैसे जल प्रवाहो से पर्वत बहाया नहीं जा सकता, वैसे ही विचारवान्, एकमात्र ब्रह्मरूप पद में
समासीन तथा आत्मा में बुद्धि की विश्रान्ति लेनेवाला महामति लोभ आदि विकल्प समूहों से बहाया
नहीं जा सकता