Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 99
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 99 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 99
संस्कृत श्लोक
संप्राप्य साम्राज्यमथापदं वा सरीसृपत्वं सुरनाथतां वा ।
तिष्ठत्यखेदोदयमस्तहर्षं क्षयोदयेष्विन्दुरिवैकरूपः ॥ ९९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चन्द्रमा कलाओं की वृद्धि ओर कलाओं
के हास या उदय एवं अस्तमय काल में एकरूप रहते हे, वैसे ही ज्ञानी साम्राज्य और दरिद्रता आदि
आपत्ति तथा सर्पादि योनि अथवा देवताओं की स्वामिता प्राप्त कर खेदशून्य तथा हर्षशून्य होकर
एक रूप से स्थित रहता हे