Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
मैरेयमदिराक्षीररक्तमेदोरसासवैः ।
रूक्षास्थितृणकेशान्तैर्न हृष्यति न कुप्यति ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
राक्षस, पिशाच आदि में भी जीवन्मुक्त हो सकते है, इसलिए उनका भी सग्रह करने के लिए
तत्साधारण कहते है ।
मैरेय (मद्यविशेष), मदिरा, क्षीर, रक्त, चरबी, आसव, रुक्ष हड्डी, तृण और केश इन सबसे
ज्ञानी न प्रसन्न होता है और न तो कुपित ही होता हे