Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 29

अट्ठाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग तत्त्वज्ञान से रामचन्द्रजी की विश्रान्ति, कथित अर्थ का फिर विस्तार, कैलास पर्वत पर शिवजी के द्वारा पहले उस प्रकार का अपने प्रति उपदेश इन सब विषयों का वर्णन ।

138 verse-groups

  1. Verses 1–2कृपापूर्वक इस प्रकार के चमत्कारपूर्ण हुए उपदेशों से महाराज वस्निष्ठजी द्वारा प्रतिबोधित ह…
  2. Verse 3राजन्‌, तदनन्तर जब आधा मुहूर्त व्यतीत हो गया और श्रीरामभद्र प्रबुद्ध हो गये यानी समाधि से…
  3. Verse 4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, आप भली प्रकार तत्त्वज्ञानी हो चुके हैं, अपनी आत्मा को…
  4. Verse 5उसमें उपाय बतलाते हैं। हे रघुनन्दन, यह संसाररूपी चक्र भ्रमण से तभी रुक जाता है, जब कि एकम…
  5. Verse 6भद्र, संकल्पात्मक मनोरूप नाभि को रागद्वेष आदि से विक्षोभित-भ्रमित यानी नचाये जाने पर यह स…
  6. Verse 7इसलिए उत्तम पुरुषार्थ का यानी ज्ञानाभ्यास एवं वैराग्य की दृढ़ता का अवलम्बन कर शास्त्रानुस…
  7. Verse 8भद्र, कहीं पर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्य से परिपूर्ण शास…
  8. Verse 9इसलिये बालबुद्धि से कल्पित एकमात्र दैवपराधीनता का परित्याग कर और असली प्रयत्न का आश्रय ले…
  9. Verse 10हे अनघ, ब्रह्माजी से लेकर चले आ रहे इस अज्ञानरूपी विभ्रम से यह असद्रूप ही प्रपंच सत्‌-सा…
  10. Verse 11हे पापशून्य राघव, एकमात्र अज्ञानरूपी भ्रम से विस्तार को प्राप्त हुए दृश्य जगत के आधारभूत…
  11. Verse 12हे श्रीरामजी, एकमात्र देह के विनाश से इष्ट सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योकि देह के नष्ट हो…
  12. Verse 13श्रीरामजी, दुःख से सदा मलिनमुख तथा अश्रु आदि से निरन्तर आद्र रहनेवाला यह देहधारी नर चित्र…
  13. Verse 14श्रीरामजी, आधि ओर व्याधि से निरन्तर दुःखित, अश्रु आदि से अर्द्र तथा स्वयं विनाशशील इस शरी…
  14. Verse 15इस प्रसिद्ध शरीर में निनिमित्तविनाशिता भी चित्रलिखित देह की अपेक्षा अधिक दोष है, ऐसा कहते…
  15. Verse 16चित्रित मनुष्य की यदि भली-भाँति रक्षा की जाय, तो वह दीर्घकालिक स्थिर शोभा धारण करता है और…
  16. Verse 17इसलिए चित्रित देह ही श्रेष्ठ है,संकल्पजनित यह तुच्छ देह श्रेष्ठ नहीं, क्योकि जो चित्रदेह…
  17. Verse 18हे निष्पाप श्रीरामजी, अत्यन्त जड़ चित्रित शरीर की अपेक्षा भी जो यह संकल्पजनित तुच्छातितुच…
  18. Verse 19हे महामते, यह संकल्पजनित शरीर कुछ दीर्घकालतक ही टिकनेवाला है। उसमें तनिक भी आसक्ति नहीं क…
  19. Verse 20भद्र, स्वप्न आदि शरीर स्वल्पकालीन संकल्प से जनित होने के कारण दीर्घ-कालीन सुख-दुः:खों से…
  20. Verse 21संकल्पविकार यह शरीर न तो स्वयं है और न हम लोगों का सम्बन्धी (आत्मा का सम्बन्धी) ही है, अत…
  21. Verse 22अतः चित्र आदि के शरीरो की क्षति के सदश इस शरीर की क्षति के विषय में भी शोक नहीं करना चाहि…
  22. Verses 23–25जिस प्रकार मनोराज्य में उत्पन्न अनेक शरीर आदि पदार्थो के क्षत या क्षीण हो जाने पर आत्मा क…
  23. Verse 26चित्त के संकल्प से कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्न रूप इस देह के अलंकारों से भूषित या दोषों…
  24. Verse 27क्यो आत्मा का कुछ भी नहीं बिगडने पाता ? इस पर कहते हैं। रामभद्र, आत्म-चैतन्यरूप ब्रह्म न…
  25. Verses 28–29घूम रहे चाक के ऊपर स्थित अत्यन्त मोहित पुरुष जैसे दिशाचक्र को स्वयं जिस चक्र पर चढ़ा हुआ…
  26. Verse 30उसी अज्ञानरूपी चक्र के ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देह परम्परारूपी चक्र को देखता रहता है,…
  27. Verse 31इसलिए हे भद्र, उत्तम धैर्य का भली प्रकार अवलम्बन कर इस अनादि दृढीभूत भ्रम का परित्याग कर…
  28. Verse 32भद्र, मिथ्या अज्ञान के द्वारा एकमात्र संकल्प से उत्पन्न हुआ यह शरीर प्रातीतिक रूप से सत्य…
  29. Verse 33रज्जु में सर्पबुद्धि के सदूश असत्स्वरूप अज्ञान से उत्पन्न हुई देह असत्स्वरूप ही जगत-क्रिय…
  30. Verse 34श्रीरामभद्र, जब व्यवहार में यह बात प्रसिद्ध है कि जड़ता से भरे पदार्थों द्वारा जो कुछ किय…
  31. Verse 35इच्छा से ही कर्तृत्व होता है, वह इच्छा तो न जड़ देह में या न निर्विकार आत्मा में ही रह सक…
  32. Verse 36आत्मा कर्ता नहीं है, इस निश्चय का फल कहते हैं। जैसे वायुशून्य प्रदेश में रहनेवाला दीपक अप…
  33. Verse 37तब राज्य-व्यवस्था कैसे चलेगी ? इस पर कहते है । हे श्रीरामजी, जैसे दूरातिदूर आकाश में स्थि…
  34. Verses 38–39देह में सत्यबुद्धि होने पर तो देहाभिमानरूप अहंकार के आ जाने के कारण उसकी दासता बनी ही रहे…
  35. Verse 40रामभद्र, आप इस दुष्टबुद्धि अहंकार की दासता को प्राप्त मत हो जाइए, क्योकि इसकी दासता से नर…
  36. Verse 41अहंकार के रहने पर दूसरा भी अनर्थ प्राप्त होता है, यह कहते है । देहरूपी घर में अपने नानावि…
  37. Verse 42शून्य देहरूपी घर प्राप्तकर चित्तरूपी यक्ष ने वह काम किया है, जिससे कि बड़े-बड़े तत्त्ववेत…
  38. Verses 43–44अपने तुच्छ शरीररूपी मन्दिर से चित्तरूपी वेताल को हटा देने से इस संसाररूपी शून्य नगर में प…
  39. Verse 45चित्तरूपी पिशाच से अभिभूत इस शरीररूपी घर मे जो आसक्त हैँ, वे अनन्तकोटि शरीरो के विनष्ट हो…
  40. Verse 46हे साधो, अहंकाररूपी बड़े यक्ष के घररूपी त्रिविध तापरूप अग्नि से दग्ध हुए शरीर में आसक्ति…
  41. Verse 47पहले विशद बुद्धि से अहंकार की दासता छोडकर तदनन्तर योगभूमिका के अभ्यास से अहंकार का आत्यन्…
  42. Verse 48नरक की चाह रखनेवाले जो जीव अहंकाररूपी पिशाच से आक्रान्त हैं, मोहरूपी मद से अन्धे उन जीवों…
  43. Verse 49जब अहंकार से परिपूर्ण बुद्धि से कोई क्रिया की जाती है, तब विषवल्ली के फल के सदृश उसका फल,…
  44. Verse 50विवेक एवं धैर्य से हीन जिस मूर्ख ने अपने अहंकाररूपी महोत्सव का अवलम्बन किया, उसे आप तत्का…
  45. Verse 51अहंकार को परलोक मे भी दुःख ही प्राप्त होता है, यों कहते हैं। हे राघव, जिन बिचारों को अहंक…
  46. Verse 52जिस अपनी देहरूपी वृक्ष के कोटर में यानी हृदय में अहंकाररूपी सर्प चारों ओर फूत्कार करता रह…
  47. Verse 53हे महान व्यक्तियों में श्रेष्ठ रामभद्र, इस देह में अहंकाररूपी पिशाच रहे अथवा चला जाय, परन…
  48. Verse 54केवल न देखने से ही क्या होगा। इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, चित्त से ही बुरी तरह फटकारा ग…
  49. Verse 55अहंकार का अनुसरण करने से ही आत्मा को अनर्थ प्राप्त होता है उसकी उपेक्षा करने पर तो विद्यम…
  50. Verse 56हे श्रीरामजी, चित्तरूपी यक्ष से पराजित हुए पुरुषों को जो बड़ी-बड़ी आपत्तियाँ प्राप्त होती…
  51. Verse 57हे पापशून्य राघव, “हा ! हा! मैं मर गया हूँ, मैं जल गया हूँ” इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं,…
  52. Verse 58*अहम्‌ इस प्रतीति से आत्मा का ही अनुभव होता है। यह जो नैयायिको की भ्रान्ति है, उसका निवार…
  53. Verse 59हे श्रीरामजी, सूत्रात्मा प्राण से संयुक्त यह चंचल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एवं जो कुछ ल…
  54. Verse 60जब समस्त चेष्टाओं का निमित्त अहंकार ही है, आत्मा नहीं; तब तो केनेषितं पतति प्रेषितं मनः क…
  55. Verse 61उपचार में हेतु मन आदि में सत्ता एवं स्फूर्ति का प्रदान करना ही है, यह कहते हैं। एकमात्र आ…
  56. Verses 62–63हे श्रीरामजी, निरन्तर दूर रहनेवाले चैतन्यरूप ओर जडरूप आत्मा एवं चित्त का, पृथिवी ओर आकाश…
  57. Verse 64शंका हो कि आत्मा का मन आदि के साथ यदि सम्बन्ध न होगा, तो उनमें सत्ता का स्फुरण ही नहीं हो…
  58. Verse 65श्रीरामजी, वस्तुतः आप सर्वज्ञ आत्मस्वरूप ही है, मनोरूप नहीं इसलिए तत्काल ही मनोरूप मोह को…
  59. Verse 66हे सर्वश्रेष्ठ श्रीरामजी, शून्यदेहरूपी घर में स्थित यह मनरूपी दुष्टात्मा पिशाच, वास्तव मे…
  60. Verse 67श्रीरामजी, संसार को देने तथा धैर्यरूपी सर्वस्व को चुरा लेने वाले अभद्र, मनरूपी पिशाच का प…
  61. Verse 68चित्तरूपी यक्ष से दृढतापूर्वक दबाये गये मनुष्य की न शास्त्र, न बन्धु और न गुरु ही भलीभाँत…
  62. Verse 69जिस पुरुष का चित्तरूपी वेताल अपने दुष्ट व्यापारो से विरत हो चुका है यानी जिसका चित्त शुद्…
  63. Verse 70इस जगतरूपी शून्य-नगर में सभी देहरूपी घर मदोन्मत्त तथा व्यर्थ की गर्जना करनेवाले चित्तरूपी…
  64. Verse 71भद्र, चित्तरूपी वेताल से वेष्टित तथा देहरूपी छोटे भाग में उत्पन्न (&) किस इच्छा से प्रेषि…
  65. Verses 72–73उपर्युक्त श्लोक में समस्त” यह जो कहा गया है, वह उत्सर्ग है, क्योंकि उससे विपरीत भी कहीं प…
  66. Verse 74इसलिए अज्ञानियों की देह श्मशान- भूमि के तुल्य ही है, यों निन्दा करते हैं। हे रघुनन्दन, इस…
  67. Verse 75हे श्रीरामजी, संचरण कर रहे प्राणीरूपी मृगों से व्याप्त इस संसाररूपी अरण्य में, हिरन के बच…
  68. Verse 76श्रीरामभद्र, इस पृथ्वीतल के अरण्य में दूसरे अज्ञानी जीव, हिरन के बच्चों की नाई यदि विषयरू…
  69. Verse 77श्रीरामजी, दूसरे मनुष्य-मृग मुग्ध होकर अपने अरण्यरूप जम्बूद्वीप में जिस प्रकार (विषयरूपी…
  70. Verse 78समानस्वभाव होने के कारण बन्धुजनो के साथ सदा ही अवस्थान और उनसे सुख देखा गया है, फिर उसमे…
  71. Verse 79श्रीरामजी, आपको विषयरूपी सर्पो का बहिष्कार कर देना चाहिए, आर्यो के मार्ग का अनुसरण करना च…
  72. Verse 80अपवित्र, तुच्छ, भाग्यरहित तथा दुष्टरूपवाले शरीर के लिए आसक्तिरूपी कीचड़ मेँ कभी फँसना नही…
  73. Verse 81इस देह की रचना एक ने (कर्म ने) की है, उसका आश्रय दूसरे अहंकार रूपी यक्ष ने किया है, दुःख…
  74. Verse 82सत्यत्व ओर एकरूप होने से आत्मा में भी दुःख ओर उसके भोग, भोक्ता शरीर आदि रूपान्तरका अवकाश…
  75. Verse 83जिस प्रकार पत्थर का काठिन्य पत्थर से पृथक्‌ अस्तित्व नहीं रखता, उसी प्रकार समष्टि-व्यष्टय…
  76. Verse 84यह न्याय प्रत्येक घट और घटाकार मानसवृत्ति आदि में भी लगाना चाहिए, इससे सद्रूप अद्वैत ही स…
  77. Verse 85भद्र, इस अर्थ में आगे कही जानेवाली मानस-शिवपूजारूप इस दूसरी दृष्टि का आप श्रवण कीजिए, जो…
  78. Verse 86उसमें पहले कैलास का वर्णन करते हुए कथा का उपक्रम करते हैं। चन्द्रमा के किरणसमूहों की नाईं…
  79. Verses 87–89वहाँ पर चन्द्रकला धारण किये हुए स्वयंप्रकाशमान भगवान महादेवजी रहते हे । पहले किसी समय उसी…
  80. Verse 90हे श्रीरामजी, उस तरह के गुणों से सम्पन्न कैलासवन के कुंजों में तपश्चर्या कर रहे मेरा बहुत…
  81. Verses 91–92अनन्तर किसी एक समय की बात है-श्रावण कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि थी और रात्रि का प्रथमभाग यान…
  82. Verse 93श्रीरामभद्र, इसी बीच प्रथम अर्धरात्रि के वहाँ व्यतीत हो जाने पर मैंने अपनी समाधि स्वल्प (…
  83. Verse 94उस समय उस अरण्य में तत्काल ही उत्पन्न हुआ एक बड़ा तेज मैंने देखा, जो शुभरातिशुभ्र सैकड़ों…
  84. Verse 95उस तेज की चकाचौंध से दिशाओं के समस्त कुज चमक उठे। मैने बड़ विस्मय के साथ देखा ओर देखकर भी…
  85. Verse 96विचार कर ज्यों ही मैं सामने का शिखर प्रदेश देखता हूँ, त्यों ही चन्द्रकलाधर महादेवजी उपस्थ…
  86. Verse 97वहाँ उपस्थित समस्त शिष्यों को सम्बोधित कर तथा अर्घ्यपात्र लेकर सावधान एवं प्रसन्‍न-मन हुआ…
  87. Verse 98वहाँ जाकर दूर से ही मैंने पुष्पांजलि समर्पित की और अर्घ्य प्रदान किया । अनन्तर तीन नेत्रव…
  88. Verse 99अपने भाग्य के महान उदय तथा अपने ऊपर महादेवजी के सानुग्रह दृष्टिपात का वर्णन करते हैं। तदन…
  89. Verse 100पुष्पों के शिखर पर स्थित तीनों लोकों के साक्षी उस देवाधिदेव को मेने समीप जाकर अर्घ्य, पुष…
  90. Verse 101उनके सामने मैंने अनेक मन्दार-पुष्पों की अंजलिर्योँ बिखेर दीं ओर नानाविध नमस्कार एवं स्तोत…
  91. Verse 102तदनन्तर मैने शिवजी की पूजा के सदृश ही पूजा से सखियों से युक्त तथा गण मण्डल से परिवेष्टित…
  92. Verse 103पूजा की समाप्ति होने पर उनकी आज्ञा से पुष्पमय शिखर पर बैठे हुए मुझसे अर्धचन्द्र की कला धा…
  93. Verse 104यद्यपि पहले कुशल प्रश्न ही किया जाता है, तथापि समस्त कुशलता की परम सीमाभूत परमात्मा में च…
  94. Verse 105तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूप से बराबर चल रहा है न ? प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली…
  95. Verse 106हे रघुनन्दन, समस्त लोकों के एकमात्र हेतु देवाधिदेव महादेवजी के उस प्रकार कहने के अनंतर वि…
  96. Verse 107हे महेश्वर, देवाधिदेव त्रिनेत्र की निरंतर स्मृति से प्राप्त हुए उत्तम कल्याण से सम्पन्न प…
  97. Verse 108आपके निरन्तर स्मरण से जनित आनन्द से जिनका चित्त चारों ओर से घूर्णित (मत्त) हो गया है, ऐसे…
  98. Verse 109भगवन्‌, एकमात्र आपके अनुस्मरण में निरन्तर जिनका मन लगा रहता है, ऐसे पुरुष जहाँ स्थित रहते…
  99. Verse 110हे प्रभो, आपका अनुस्मरण पूर्वसंचित पुण्य-वृक्ष के फल को अनन्तकोटि गुना बढ़ा देता हे, वर्त…
  100. Verse 111हे प्रभो, आपका अनुस्मरण ज्ञानरूपी अमृत का एकमात्र आधारभूत कलश है, धृतिरूपी ज्योत्स्ना के…
  101. Verse 112हे समस्त भूतो के अधिपते, आपके निरन्तर चिन्तनरूपी उदार चिन्तामणि से शोभित मैंने समस्त वर्त…
  102. Verse 113हे श्रीरामजी, सुप्रसन्न उन भगवान शंकरजी से यों कहकर नतमस्तक होकर मैंने जो कुछ वक्ष्यमाण र…
  103. Verse 114हे भगवन्‌, यद्यपि आपकी अनुकम्पा से मेरे लिए समस्त दिशाएँ अभीष्ट पदार्थों से परिपूर्ण हैं;…
  104. Verses 115–116हे प्रभो, वह देवार्चन-विधान किस तरह का है ? जो समस्त चित्त-विक्षेप के हेतुओं से वर्जित, व…
  105. Verse 117'पूर्णामेसकलादिश: ' इस कथन से महर्षिवसिष्ठजी को विषयभोग की अभिलाषा नहीं है, ऐसा द्योतन हो…
  106. Verse 118आगे कहे जानेवाले देवार्चन के अनुरूप अलौकिक देवस्वरूप का उपदेश देने के लिए शिष्य को उसकी ज…
  107. Verse 119न तो कमलोद्भव ब्रह्माजी देवता हैं और न सर्वदेवताओं के अधिपति इन्द्र ही देवता हैं न पवन, न…
  108. Verse 120हे द्विजोत्तम, वास्तव में न ब्राह्मण देवतारूप है, न राजा देवतारूप है और न मैं (८) ही देवत…
  109. Verse 121देह की शोभा भी देवरूप नहीं है और मति भी देवरूप नहीं है; किन्तु क्रियासाध्य वस्तु से विलक्…
  110. Verse 122देश और वस्तु से परिच्छिन्न तथा काल से परिच्छिन्न वस्तु में वह प्रकाश ही कहाँ रहता है ? (त…
  111. Verse 123चूँकि, जगत, जीव और उसका संसार - ये सब उसकी सत्ता से ही अस्तित्वरूप अपना स्वरूप धारण करते…
  112. Verse 124तब क्या पुण्डरीकाक्ष आदि मूर्तियों की पूजा का जो विधान है, वह व्यर्थ है ? इस पर नहीं, ऐसा…
  113. Verse 125पूजन आदि से प्रसन्न हुए रुद्र आदि देवताओं से इयत्ता आदि से परिच्छिन्न ही फल प्राप्त होता…
  114. Verse 126यदि शंका हो कि कृत्रिम विषयभोग अनात्म-पूजन से ही सिद्ध होते हैं, इसलिए उनके लाभार्थ कृत्र…
  115. Verse 127तो अकृत्रिम पूजन में कौन-सी सामग्री है ? इस शंका पर उस सामग्री का उल्लेख करते हैं। कौन पू…
  116. Verse 128हे महर्षे, प्रकाशमान आत्मदेव की शम, बोध आदि पुष्पों से जो पूजा की जाती है, उसीको आप देवार…
  117. Verse 129जो मनुष्य आत्मज्ञानरूप देवार्चन छोड़कर कृत्रिम पूजनों में ही आसक्त रहते हैं, वे चिरकालतक…
  118. Verse 130हे ब्रह्मन्‌, जो विदिततत््व सन्त-महात्मा किसी समय आत्म-समाधि से व्युत्थित होकर साकार देवप…
  119. Verse 131आत्मा ही प्रकाशमान देव, छः प्रकार के एश्वर्य से परिपूर्ण, शिव ओर परम कारणस्वरूप है । (अतः…
  120. Verse 132हे वसिष्ठजी, आप जीव को अपरोक्ष चेतनाकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम ब्रह्मस्वरूप ही जानिए, एकम…
  121. Verse 133(तदेवाऽस्ति यतः सर्वम्‌” इत्यादि श्लोक से ब्रह्म ही जगत, जीव, जीवसंसार और उनके अर्तित्वरू…
  122. Verse 134समस्त चेत्य पदार्थों का प्रलय हो जानेपर भी (चित्सत्ता' ज्यों की त्यो बनी रहती है, इससे (च…
  123. Verses 135–136तब जगद्रूप प्रतिभास कैसे होता है ? इस पर कहते हैं। सूर्य, चन्द्र, दीपक, इन्द्रिय, मन आदि…
  124. Verses 137–138उक्त रीति से एकमात्र चिदात्मस्वरूप ही सिद्ध हो रहा विचित्ररूप यह जगत स्वप्ननगर के सदृश भ्…
  125. Verse 139इसलिए स्वप्न-नगर के सदुश जो यह जगत भासता है, उस चिदाकाशमात्रस्वरूप जगत में भिन्नता का अवक…
  126. Verse 140महर्षे, सृष्टि के आरम्भ में ऊर्ध्व-लोक, अपना नगर तथा पाताल-इनमें कहीं पर भी चिदाकाशमात्रस…
  127. Verse 141यदि शंका हो कि जैसे यजति, ददाति, जुहोति” इत्यादि शब्दभेदो से कर्मभेद होता है, वैसे ही चित…
  128. Verse 142उक्त रीति से जब तत्त्ववेत्ता द्वारा स्वप्न, संकल्प और माया के सदृश मिथ्या द्वैत अनुभूत हो…
  129. Verse 143जिस प्रकार स्वप्न में चिदाकाश ही जगद्रूप भासता है, उसी प्रकार जाग्रत-नामक स्वप्न में भी व…
  130. Verse 144जिस प्रकार स्वप्न-नगर में चिदाकाश को छोडकर दूसरा कुछ भी पदार्थ कहीं नहीं रहता, उसी प्रकार…
  131. Verse 145चूँकि चित्‌ से भिन्न दूसरा कुछ भी चेत्यपदार्थ नहीं हो सकता, इसलिए चित्त और चेत्यात्मक समस…
  132. Verse 146परमाकाशस्वरूप ब्रह्म का संकल्प ही (“बहु स्यां प्रजायेय” इत्यादि श्रुति में दर्शित प्रथम स…
  133. Verse 147सामान्य जगत में कथित न्याय का घट, पट आदि विशेषपदार्थों में दिग्दर्शन कराते हैं। जैसे स्वप…
  134. Verse 148जैसे स्वप्नकालीन प्रतिभासमात्रस्वरूप नगर में विशुद्धचैतन्यमात्ररूप आत्मा को छोड़कर दूसरा…
  135. Verse 149जो कुछ विभिन्‍न-विभिनन दृष्टियाँ हैं तथा जो-जो तीनों कालों में रहनेवाले देश, काल और चित्त…
  136. Verse 150महर्षे, जो परमार्थतः सबसे श्रेष्ठ है, जो तुम्हारा, “तत्‌ पदार्थ का, मेरा तथा समस्त जगत का…
  137. Verse 151सभी वस्तुओं का, समस्त जगत का, दूसरे का, तुम्हारा और मेरा चैतन्याकाशरूप परमात्मा ही पारमार…
  138. Verse 152कथित प्रकरण का, अनुवादपूर्वक, उपसंहार करते हैं। हे मुने, जिस प्रकार संकल्पमय पदार्थों तथा…