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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 91–92

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 91–92 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 91,92

संस्कृत श्लोक

तपः प्रचरतो राम मम कालोऽत्यवर्तत । अथैकदा कदाचित्तु बहुलस्याष्टमे दिने ॥ ९१ ॥ गते श्रावणपक्षस्य रात्र्यग्रे क्षयमागते । दिक्षु संशान्तरूपासु काष्ठमौनस्थितास्विव ॥ ९२ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्तर किसी एक समय की बात है-श्रावण कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि थी और रात्रि का प्रथमभाग यानी प्रदोषसमय पूजा, जप, ध्यान आदि से व्यतीत हो चुका था। प्राणियों के संचरण आदि व्यापारो का उपशम हो जाने से शान्तस्वरूप हुई दिशाएँ उस समय काठ की नाई मोन -व्रत में (हाथ आदि के व्यापारों से भी हृदयगत अभिप्राय को प्रकट न करने के कारण काठ की नाई मौनव्रत में) मानों अवस्थित थीं । गहन कुंजों में अन्धकार इतना घना था कि वह तलवार से काटने योग्य बन गया था