Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 133
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 133 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 133
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चेतनाकाशमात्रात्म यथा जगदिदं प्रभो ।
यथा तच्चेतनस्यैव जीवादित्वं तदुच्यताम् ॥ १३३ ॥
हिन्दी अर्थ
(तदेवाऽस्ति यतः सर्वम्” इत्यादि श्लोक से ब्रह्म ही जगत, जीव, जीवसंसार और उनके
अर्तित्वरूप से स्थित है, यह जो पहले कहा गया था, उसमें उपपत्ति जानने की इच्छा से महाराज
वसिष्ठजी पूछते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे प्रभो, यह जगत जिस उपपत्ति से चैतन्यप्रकाशमात्रस्वरूप होता है
तथा जिस उपपत्ति से उसी चेतन में जीवादिस्वरूपता प्राप्त होती है, उसे (आप कृपाकर मुझसे)
कहिए