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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 60

संस्कृत श्लोक

वृक्षोत्पत्तौ यथा हेतुरकर्त्रपि किलाम्बरम् । आत्मसंस्थस्तथेहात्मा चित्तचेष्टासु कारणम् ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

जब समस्त चेष्टाओं का निमित्त अहंकार ही है, आत्मा नहीं; तब तो केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राण: प्रथमः प्रेति युक्तः^ (ऊर्ध्वं प्राणमुतिदतमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते“ (७) इत्यादि श्रुतियों के साथ विरोध होगा, इस पर कहते हैँ । जिस प्रकार कर्तृत्व से शून्य भी आकाश वृक्ष की उत्पत्ति में कारण है, वैसे ही अपने स्वरूप से स्थित आत्मा भी इन चित्त की चेष्टाओं मे कारण है-यों श्रुतियों द्वारा गौणरूप से कहा जाता है