Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सुखदुःखविचारित्वं न कार्यं राम धीमता ।
दुःखम्लानमुखः क्लेदी प्रसन्नात्क्लेदवर्जितात् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, दुःख से सदा मलिनमुख तथा अश्रु आदि से निरन्तर
आद्र रहनेवाला यह देहधारी नर चित्रलिखित नर की अपेक्षा भी अत्यन्त तुच्छ कहा गया है, क्योकि
चित्रलिखित नर तो सुख-दुःख की चिन्ता से निर्मुक्त होने के कारण सदा प्रसन्न ओर स्वेद अश्रु आदि
से वर्जित रहता है