Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
देहालये स्फुरत्यस्मिन् राम चित्तपिशाचके ।
अस्यानन्तविलासस्य किमिवागतमात्मनः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकार का अनुसरण करने से ही आत्मा को अनर्थ प्राप्त होता है उसकी उपेक्षा करने पर तो
विद्यमान रहता हुआ भी वह कुछ नहीं कर सकता, ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, इस देहरूपी घर में चित्तरूपी पिशाच के स्फुरित होने पर भी असीम विलासों से
सम्पन्न इस आत्मा में क्या आया ?