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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 23–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

तथा संकल्पपुरुषे क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः । यथा मनोराज्यमये क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः ॥ २३ ॥ यथा द्वितीये शशिनि क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः । यथा स्वप्नसमारम्भे क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः ॥ २४ ॥ यथा नद्यातपजले क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः । संकल्पमात्ररचिते प्रकृत्यैव च नाशिनि ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार मनोराज्य में उत्पन्न अनेक शरीर आदि पदार्थो के क्षत या क्षीण हो जाने पर आत्मा की कुछ भी क्षति नहीं होती, अथवा जिस प्रकार दूसरे चन्द्रमा के क्षत या क्षीण हो जाने पर असली चन्द्रमा की या आत्मा की कुछ भी क्षति नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्न में उत्पन्न पदार्थों के क्षत या विनष्ट हो जाने पर आत्मा की क्षति नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णिका-नदी के प्रकाशरूप जल के क्षत या क्षीण हो जाने पर आत्मा की कुछ भी क्षति नहीं होती; उसी प्रकार एकमात्र संकल्प से उत्पन्न, स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्र के क्षत या विनष्ट हो जाने पर आत्मा की कुछ भी क्षति नहीं होती अतः शरीर के लिए शोक करना निरर्थक ही हे