Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
निरीहो हि जडो देहो नात्मनोऽस्याभिवाञ्छितम् ।
कर्ता न कश्चिदेवातो द्रष्टा केवलमस्य सः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छा से ही कर्तृत्व होता है, वह इच्छा तो न जड़ देह में या न निर्विकार आत्मा में ही रह सकती है,
यह कहते हैं।
जड़ देह तो इच्छा से रहित है और इस निर्विकार आत्मा में इच्छा रहती नहीं, इसलिए कोई कर्ता है
ही नहीं, केवल आत्मा शरीर का द्रष्टा है