Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 146
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 146 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 146
संस्कृत श्लोक
परमाकाशकलनं त्रिजगत्स्वयमुत्थितम् ।
स्वप्नवद्विद्धि चिद्व्योम्नि न त्वेतद्द्वैतवत्स्थितम् ॥ १४६ ॥
हिन्दी अर्थ
परमाकाशस्वरूप ब्रह्म का संकल्प ही (“बहु स्यां प्रजायेय” इत्यादि श्रुति में दर्शित
प्रथम संकल्प ही) तीनों जगत-रूप होकर चिदाकाश में स्वप्न के सदश स्वयं ही उत्पन्न हुआ है, वास्तव
में द्वैतवादी द्वारा स्वीकृत सत्यवस्तु के सदुश यह सत्य नहीं है, ऐसा समझिए