Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 87–89
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 87–89 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 87-89
संस्कृत श्लोक
कैलासो नाम शैलेन्द्रो गौरीरमणमन्दिरम् ।
तत्रास्ते भगवान्देवो हरश्चन्द्रकलाधरः ॥ ८७ ॥
तं पूजयन्महादेवं तस्मिन्नेव गिरौ पुरा ।
कदाचिदवसं गङ्गातटे विरचिताश्रमः ॥ ८८ ॥
तपोर्थं तापसाचारे चिराय रचितस्थितिः ।
सिद्धसंघातवलितः कृतशास्त्रार्थसंग्रहः ॥ ८९ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ
पर चन्द्रकला धारण किये हुए स्वयंप्रकाशमान भगवान महादेवजी रहते हे । पहले किसी समय उसी
पर्वतपर उन देवाधिदेव की पूजा कर रहा मैं गंगाजी के किनारे आश्रम बनाकर रहता था। तप के लिए
वहाँ पर मैंने दीर्घकाल तपरिवयों द्वारा अनुष्ठीयमान कृच्छर चान्द्रायण आदि में नियमपूर्वक निष्ठा की।
वहाँ पर मेरे चारों ओर सिद्धों के समूह रहते थे। मैं उनसे विचारविनिमय कर शास्त्रीय दुरूह तत्त्वों का
संग्रह करता था। मैंने फूल चुनने के लिए एक डलिया (टोकरी) रक्खी थी ओर अनेक शास्त्रीय पुस्तकों
का संग्रह भी किया था