Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 74
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 74
संस्कृत श्लोक
अस्यां जगदरण्यान्यां मुह्यन्तं मुग्धबालवत् ।
स्वयमाराध्य धैर्याशमात्मनात्मानमुद्धरेत् ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए अज्ञानियों की देह श्मशान- भूमि के तुल्य ही है, यों निन्दा करते हैं।
हे रघुनन्दन, इस संसार में जो-जो दिशाँ सुनाई देती हैं, वे सभी देहरूपी श्मशान-भूमि में मंगल
मनानेवाले मदोन्मत्त मोहरूपी वेतालो से परिपूर्ण हैं ॥७ ३॥ इस जगतरूपी महान अरण्य में, अज्ञानी
बालक की नाई, मोहित हो रही अपनी आत्मा का, स्वयं दृढता से धेर्य को धारण कर, अपने से ही उद्धार
कर लेना चाहिए