Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 81
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 81 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
अन्येन रचितो देहो यक्षेणान्येन संश्रितः ।
दुःखमन्यस्य भोक्तान्यश्चित्रेयं मौर्ख्यचक्रिका ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस देह की रचना एक ने (कर्म ने) की है, उसका आश्रय
दूसरे अहंकार रूपी यक्ष ने किया है, दुःख किसी तीसरे को मिलता है ओर भोक्ता तो कोई चौथा ही
(जीव) हे, इस प्रकार की यह अज्ञान की चक्रिका (चल रही परम्परा) आश्चर्यरूप ही है