Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 120
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 120 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 120
संस्कृत श्लोक
न ब्राह्मणो नाऽवनिपो नाहं न त्वं द्विजोत्तम ।
न देवो देहरूपो हि न देवश्चित्तरूपधृक् ॥ १२० ॥
हिन्दी अर्थ
हे द्विजोत्तम, वास्तव में न ब्राह्मण देवतारूप है, न
राजा देवतारूप है और न मैं (८) ही देवतारूप हूँ, न तुम देवतारूप हो, न आध्यात्मिकभाव से
आपन्न देह आदि पदार्थ ही देवतारूप हैं (70) और न चित्तरूपधारी व्यक्तिविशेष ही देवतारूप
(५) यहाँ पर "महाबाहु" शब्द का अर्थ है -निरन्तर देवार्चन से सफलीकृतबाहूु । इससे यह सूचित
हुआ कि बाहुसापेक्ष बाहर की केवल पूजा में ही शूरता बतलाने के लिए सम्बोधन किया गया है । यदि शंका
हो कि पुण्डरीकाक्ष और त्रिलोचन आदि देवता तो प्रसिद्ध ही हैं, फिर भगवान इस साधारण विषय में मुझे
अनभिज्ञ क्यों मानते हैं ? इस प्रकार के अभिप्राय वाले वसिष्ठजी की परिच्छिन्न पदार्थो में श्रद्धारूपी
जडता का प्रथम अपाकरण करने के लिए यहाँ पर “न देवाः“ इत्यादि ग्रन्थ है, यह समझना चाहिए ।
(5) “नाहं न त्वम्“ यह निषेध-रुद्र ओर वसिष्ठ में "तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रद्राः“ (उत्क्रमणकाल में
सम्बन्धियों को रुलाते हैं, अतः प्राण रुद्रनामवाले हैं), "यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्रसिष्ठोऽसि" (जो मैं
वाक् वसिष्ठत्व गुण से युक्त हूँ, उस गुण से तुम-प्राण-वसिष्ठ हो) इत्यादि श्रुतियों मे मुख्य समष्टि
प्राणरूपता की प्रसिद्धि से तथा "कतम एको देव इति प्राणः“ इत्यादि प्राण की ही सर्वदेवत्वरूपता प्रतिपादक
श्रुति से प्राणभाव से प्राप्त हुए देवस्वरूपत्व का निवारण करने के लिए-किया गया है ।
(00) 'नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्शत्^ इत्यादि श्रुतियों मे आध्यात्मिक चक्षु आदि के लिए देवशब्द के
हे