Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्याकर्णयति स्वस्थसमचेतसि राघवे ।
विश्रान्ते स्वात्मनि स्वैरं परमानन्दमागते ॥ १ ॥
तत्रस्थेषु च सर्वेषु तेषूपशमशालिषु ।
राघवस्यात्मविश्रान्तेः स्थित्यर्थं वचनामृतम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कृपापूर्वक इस प्रकार के चमत्कारपूर्ण हुए उपदेशों से महाराज वस्निष्ठजी द्वारा प्रतिबोधित हुए
श्रीरामभद्र एवं दूसरे श्रोताओं को जो ततत्वसाक्षात्कार उत्पन्न हुआ उससे आधे मुहूर्त तक उनकी अपने-
अपने स्वरूपो में विश्रान्तिरूप समाधि से निश्चल स्थिति हो गई यों श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं।
श्री वाल्मीकिजी ने कहा : राजन्, जिस समय अपने स्वरूप में आपोआप विश्रान्ति एवं परमानन्द
को प्राप्त हूए स्वस्थ ओर समचित्त श्रीरामभद्र उस प्रकार श्रवण कर रहे थे तथा उस सभा में स्थित
शान्त चित्त सभी श्रोतागण अपनी आत्मा में परम विश्रान्ति का अनुभव कर रहे थे, उस समय श्रीरामभद्र
की चित्तविश्रान्ति की सुदृढ़ स्थिति के लिए बरस रहा महाराज वसिष्ठजी का वचनामृत एकाएक ऐसे
बन्द हो गया, जैसे वृष्टितर्पित सस्यों में (खेतों में) मेघमण्डल से जल का बरसना एकाएक बन्द हो
जाय
सर्ग सन्दर्भ
अट्ठाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग तत्त्वज्ञान से रामचन्द्रजी की विश्रान्ति, कथित अर्थ का फिर विस्तार, कैलास पर्वत पर शिवजी के द्वारा पहले उस प्रकार का अपने प्रति उपदेश इन सब विषयों का वर्णन ।