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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 117

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 117 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 117

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । शृणु ब्रह्मविदां श्रेष्ठ देवार्चनमनुत्तमम् । वदामि मुच्यते येन कृतेन सकृदेव हि ॥ ११७ ॥

हिन्दी अर्थ

'पूर्णामेसकलादिश: ' इस कथन से महर्षिवसिष्ठजी को विषयभोग की अभिलाषा नहीं है, ऐसा द्योतन हो जाता है। अतः सर्वपापक्षयकरं सर्वकल्याणवर्धनम्‌” इन दो विशेषणो से समस्त अनर्थनिवृत्ति से उपलक्षित निरतिशयानन्दस्वरूप मोक्षसाधन के विषय में ही यह वसिष्ठजी का प्रश्न है, यों सर्वज्ञ परम कारुणिक सदाशिव ने पहले निश्चय किया, अनन्तर सर्वतोभावेन शरणागत वसिष्ठजी को स्वदिवार्चन के परम रहस्य-भूत परम पुरुषार्थ के साधन तत्त्वज्ञान के उपदेश की इच्छा से भगवान प्रतिज्ञा करते हैं । ईश्वर ने कहा : हे ब्रह्मज्ञानियों में अग्रगण्य मुनिवर, मैं तुमसे सर्वश्रेष्ठ वह देवार्चन का विधान कहता हूँ, जिसका अनुष्ठान करने से तत्काल ही मनुष्य मुक्त हो जाता हे