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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 28–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

न ब्रह्म विकृतिं याति किंवा देहक्षये क्षतम् । भ्रमच्चक्रोपरिष्ठो हि पूर्वचक्रोपचक्रवत् ॥ २८ ॥ यथा पश्यति दिक्चक्रं भ्रमदत्यन्तमोहितः । अकस्मादेव रुढेन मिथ्याज्ञानेन वल्गता ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

घूम रहे चाक के ऊपर स्थित अत्यन्त मोहित पुरुष जैसे दिशाचक्र को स्वयं जिस चक्र पर चढ़ा हुआ रहता है, उस चक्र के सदृश या चारों ओर पास मेँ स्थित बड़े चक्र के सदृश विपरीतरूप से घूमता हुआ देखता है, वैसे ही अकस्मात उत्पन्न हुए गर्जनशील मिथ्या अज्ञान के कारण मिथ्या अज्ञानरूप चक्र के ऊपर स्थित जीवात्मा देहपरम्परारूपी चक्र को देखता रहता हे