Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 82
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 82 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 82
संस्कृत श्लोक
यथैकरूपा घनता दृषदोऽस्त्यात्मनस्तथा ।
सत्तामात्रैकसामान्यादितरस्याप्यसंभवात् ॥ ८२ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्यत्व ओर एकरूप होने से आत्मा में भी दुःख ओर उसके भोग, भोक्ता शरीर आदि रूपान्तरका
अवकाश नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
जिस प्रकार पत्थर की घनता सत्तासामान्य से पृथक् रूप नहीं है किन्तु एकरूप ही है, उसी प्रकार
आत्मा की घनता भी एकमात्र सामान्यात्मक सत्तास्वरूप से पृथक् नहीं है किन्तु अभिन्नरूप ही है,
क्योंकि सद्रूप से पृथक् दूसरा रूप ही नहीं है, अर्थात् जो सद्धिन्न है उसकी असत्, अलीक आदि पदों
से ही प्रसिद्धि है, यह तात्पर्य है