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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 140

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 140 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 140

संस्कृत श्लोक

चिद्व्योममात्रादितरत्सर्गादौ सर्ववेदने । भिन्नस्वर्गे पुरे वापि किं संभवति कथ्यताम् ॥ १४० ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षे, सृष्टि के आरम्भ में ऊर्ध्व-लोक, अपना नगर तथा पाताल-इनमें कहीं पर भी चिदाकाशमात्रस्वरूप आत्मा से भिन्न ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सबके अनुभव में आती हो, उसे आप बतलाइए ? (तात्पर्य यह है कि चिद्भिन्न की स्वतः सत्तास्फूर्ति मानने पर अचित्त्व का व्याघात, सत्तास्फूर्ति के अभाव मेँ अलीकरूपता, अलीक का चित्‌ से भी उलज्जीवन अनुभूत न होने से, असंग होने के कारण चित्‌ का अचित्‌ के साथ सम्बन्ध न होने से और साधकान्तर की अप्रसिद्धि होने से चिद्धिन्न पदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती ।)