Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 115–116
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verses 115–116 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 115,116
संस्कृत श्लोक
किंतु पृच्छामि देवेश संदेहे तत्र निर्णयम् ।
ब्रूहि प्रसन्नया बुद्ध्या त्यक्तोद्वेगमनामयम् ॥ ११५ ॥
सर्वपापक्षयकरं सर्वकल्याणवर्धनम् ।
देवार्चनविधानं तत्कीदृशं भवति प्रभो ॥ ११६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रभो, वह देवार्चन-विधान किस तरह का है ?
जो समस्त चित्त-विक्षेप के हेतुओं से वर्जित, विकारशून्य, समस्त पापों का विनाशकारी तथा समस्त
कल्याणो का अभिवर्धक होता है, उसे प्रसन्न-मति से आप मुझसे कहिए