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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

जडेन राम क्रियते यन्न तत्कृतमुच्यते । कुर्वन्नपि तदा देहो न कर्ता क्वचिदेव हि ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामभद्र, जब व्यवहार में यह बात प्रसिद्ध है कि जड़ता से भरे पदार्थों द्वारा जो कुछ किया गया होता है, वह उनके द्वारा किया गया नहीं माना जाता है यानी उनके द्वारा किये गये कार्यों से अपराध आदि दोषों का उनमें चेतन के समान आरोप नहीं किया जाता है, तब कुछ व्यापार कर रही भी जड़ता से भरी हुई यह देह किसी समय भी कर्ता नहीं कही जा सकती, क्योकि इच्छाधीन ही कर्तृत्व रहता है