Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
ग्रस्ते चित्तपिशाचेन देहसद्मनि ये मृताः ।
पिशाचस्येव या बुद्धिर्नापिशाचस्य राघव ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तरूपी पिशाच से अभिभूत इस शरीररूपी घर मे जो आसक्त
हैँ, वे अनन्तकोटि शरीरो के विनष्ट हो जाने पर भी अब तक देह मेँ आत्मरूपता बुद्धि से समन्वित
होकर क्यों स्थित हैं-बड़ा आश्चर्य है (निरन्तर शरीर घटना से जनित दुःखों का अनुभव होने पर भी
उसके विघटन में जो प्रयत्न नहीं करते यही आश्चर्य है, यह भाव है।)॥४ ४॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्तरूपी
पिशाच से ग्रस्त हुए देहरूपी घर में जो मर चुके हैं, उनकी जो बुद्धि है, वह पिशाच की-सी है, न कि
अपिशाच की-सी