Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 105
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 105 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 105
संस्कृत श्लोक
कच्चित्कल्याणकारिण्यः संविदस्ते स्थिताः परे ।
कच्चित्तपस्ते निर्विघ्नं कल्याणमनुवर्तते ॥ १०५ ॥
हिन्दी अर्थ
तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूप से बराबर चल रहा है न ?
प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली है न ? और सांसारिक भय शान्त हो रहे हें न ?