Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
भूषिते दूषिते देहे न हि किंचिच्चितः क्षतम् ।
न चिदन्तमुपायाति नात्मा चलति राघव ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो आत्मा का कुछ भी नहीं बिगडने पाता ? इस पर कहते हैं।
रामभद्र, आत्म-चैतन्यरूप ब्रह्म न तो विनष्ट होता है, न चलित होता है, और न विकृत ही
होता है, इसलिए देह का नाश होने पर चैतन्य का, आत्मा का या ब्रह्म का क्या बिगड़ गया ?