Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
सर्वगोऽपि यथाकाशः संबन्धो नेह केनचित् ।
सर्वगोऽपि तथैवात्मा नाहंकारेण संगतः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
*अहम् इस प्रतीति से आत्मा का ही अनुभव होता है। यह जो नैयायिको की भ्रान्ति है, उसका
निवारण करते हैं।
जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसी से संश्लिष्ट नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक
आत्मा भी अहंकार से संश्लिष्ट नहीं होता