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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 92

108 verse-groups

  1. Verses 1–3नब्बेवाँ सर्गे समाप्त इक्यानवेवों सर्ग संसाररूपी लता का कारण शरीर है, शरीर का कारण मन है…
  2. Verses 4–6हे ब्रह्मन्‌, इस प्रकार के जगत्‌-रूपी महाअरण्य का आक्रमण करके यानी वासना-प्रतानों (विस्ता…
  3. Verse 7हे वाम्मियों में सर्वश्रेष्ठ, संक्षेप से इन चार प्रश्नों का मुझको उत्तर दीजिए, जिससे कि फ…
  4. Verse 8महाराज वसिष्ठजी ने कहा : राघव, लिंगदेह में प्रच्छन्‍न (छिपे हुए) चित्र विचित्र अनन्त कार्…
  5. Verse 9जिस प्रकार शरत्‌-काल में शाखाओं के विस्तारो से गहन तथा फल और पल्लवो से शोभित होकर पृथ्वी…
  6. Verse 10तस्य कि बीजमुच्यते (उस शरीर का बीज क्या है ?) इस द्वितीय प्रश्न का उत्तर देते हैं। वैभव क…
  7. Verse 11एकमात्र तथोक्त सर्वोपरि चित्त से ही यह वर्तमान, भूत और भविष्यत्‌ के शरीर समूह उत्पन्न हुए…
  8. Verse 12हे रघुश्रेष्ठ, जिस प्रकार मुमूर्षु मरणासन्न पुरुष के उत्पात प्रदर्शनसंकल्प से युक्त चित्त…
  9. Verse 13इस प्रतिपादित अर्थ की असंभावना करना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि समस्त जगत्‌ हिरण्यगर्भ का…
  10. Verse 14तदनन्तर उसका भी बीज क्या है, इस तृतीय प्रश्न का उत्तर देते हैं। राघव अनेक तरह की वृत्तिर्…
  11. Verse 15प्रथम बीज का उपपादन करते हैं। जब हृदय की नाड़ियों में संचरण के लिए उद्युक्त होकर प्राण वा…
  12. Verse 16जब बाह्य पदार्थों के अनुभव से जिन संस्कारों का उद्बोधन होने के कारण बहत्तर हजार नाड़ी मार…
  13. Verse 17हिरण्यगर्भ की चिति की जगदाकारता भी समष्टि-प्राण के परिस्यन्दन से ही युक्त होती है, यह बात…
  14. Verse 18समष्टि प्राणस्पन्दन के विषय में उपरत उस चिति की शान्ति यानी निष्क्रियता ही शान्ति अर्थात्…
  15. Verse 19श्रीरामजी, प्राण -स्पन्दन से बोध को प्राप्त हुई संवित्‌ देहो में चक्राकार आवर्तो से उस प्…
  16. Verse 20जिस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म-स्वरूपवाली गन्धलेखा वायु से बोधित होती है, वैसे ही सूक्ष्म…
  17. Verse 21हे राघव, संवित्‌ की विक्षिप्तता न होने पर मोक्षरूप सर्वातिशायी कल्याण प्राप्त होता है, यह…
  18. Verse 22संवित्‌ का संरोध करने से क्या फल है ? ओर संवित्‌ यदि चित्ताकार हो जाय तो कौन दोष है ? इस…
  19. Verse 23जब संवित्‌ बाह्य विषयों में उदासीन होकर आत्मबोध के लिए उद्युक्त होती है, तब प्राप्त करने…
  20. Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए जिस प्रकार मूढ पुरुष प्राण-परिस्पन्दा से तथा रागातिशय के द्वारा…
  21. Verse 25श्रीरामजी, संवित्‌ की स्थूलता को (मोटेपन को) आप चित्त जानिये, संवित्‌ के स्थूलतारूपी उसी…
  22. Verse 26योगी लोग चित्त की शान्ति के लिए योगशारत्र मेँ बतलाये गये प्राणायाम, ध्यान तथा सद्गुरु के…
  23. Verse 27फल की एकता के रूप से प्राण के संरोधन की ही प्रशंसा करते है। हे श्रीरामजी, बड़े बड़े विद्व…
  24. Verse 28चित्त के अन्य बीज का वर्णन करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। हे राघव, ज्ञानी पुरुषों केद्वा…
  25. Verse 29उसमें पहले वासना का स्वरूप कहते है । पहले के जन्मों की दृढ़ भावना से देह आदि जड पदार्थो क…
  26. Verses 30–31अज्ञानी आत्माओ को तो वह संस्कार, किसी प्रकारका विरोध न होने के कारण, तीव्र संवेग और भावना…
  27. Verses 32–33वह भावना जिस प्रकार देह मे आत्मता दीखलाती है, उसी प्रकार बाह्य अर्थों में सत्ता भी दीखलात…
  28. Verse 34आत्ममिथ्याज्ञान से युक्त हुए पुरुष भीतरी वासनाओं से वशीकृत होकर, विष से वशीकृत पुरुष की न…
  29. Verse 35हे भद्र, दृढ़ अभ्यास के कारण देह आदि पदार्थो में “अहम्‌, मम” आदि आत्माध्यासरूप एकमात्र वा…
  30. Verse 36इसीलिए वासना के विनाश से विति की स्वस्थतारूप मुक्ति होती है, ऐसा कहते है। जो कुछ भी हेयस्…
  31. Verse 37हे श्रीरामजी, निरन्तर वासना का अभाव होने से जब मन मनन नहीं करता, तब अमनस्ता का उदय होता ह…
  32. Verse 38आकाश में मेव की नाई संविदाकाश में जब कुछ भी स्फुरित नहीं होता, तब आकाश में कमल की नाई चिद…
  33. Verse 39जब जगद्रूप वस्तु में किसी पदार्थ की भावना नहीं होती, तब शून्य हृदयाकाश में चित्त कैसे उत्…
  34. Verse 40हे श्रीरामचन्द्रजी, बस, इतना ही चित्त का स्वरूप मैं मानता हूँ कि राग से जगत्‌-रूपी वस्तु…
  35. Verse 41हे श्रीरामजी, इस कारण कोई भी दृश्य युक्तियों से समर्थन करने योग्य नहीं है, इस प्रकार की भ…
  36. Verse 42अब अचित्तत्व का लक्षण कहते हैं। हे श्रीरामजी, बाह्यवस्तुओं से अस्मरणरूप निरोधयोग का अवलम्…
  37. Verse 43तब वृत्ति से विशिष्ट चित्त के रहने पर जीवन्मुक्त अचित्त कैसे ? इस पर कहते हैं। हे श्रीराम…
  38. Verse 44दग्धपट के अवभास से सत्यपटरूपता नहीं कही जा सकती, किन्तु असत्यपटरूपता ही कही जा सकती है, य…
  39. Verse 45तब जीवन्मुक्त पुरुष व्यवहार क्यो करता है ? इस शंका पर कृतकार्य कुम्हार के वक्रभ्रमण की ना…
  40. Verse 46इन महानुभावो की वासना भूजे बीज के सदृश पुनर्जन्म से शून्य और रस से वर्जित यानी विषयानुरक्…
  41. Verses 47–48हे श्रीरामचन्द्रजी, जिनका चित्त सत्त्वरूपता प्राप्त कर चुका है, ऐसे ज्ञान के पारंगत हुए व…
  42. Verse 49वासना के बीज का विनाश होने पर अन्य बीज से चित्त की उत्पत्ति कयो नहीं होगी ? तो इस पर कहते…
  43. Verse 50श्रीरामजी, केवल एक मात्र घनीभूत वासना ही बलपूर्वक पुनर्जन्म उत्पन्न नहीं करती । उसका भी क…
  44. Verses 51–52इसी प्रकार चित्त की भी उन दोनों के प्रति और ऐन्द्रियक सुख-दुःख आदि के प्रति कारणता है, ऐस…
  45. Verse 53हे श्रीरामजी, चित्तरूप बीज में वासना से ही प्राण स्पन्दन होता है प्राण-स्पन्दन से वासना ह…
  46. Verse 54दोनों में चित्तउत्पादकता है, इसका प्रकार बतलाते हैं। वासना का ऊर्ध्वगति स्वभाव होने से वह…
  47. Verse 55स्पन्दनधर्मवान्‌ होने से हृदयगत राग आदि गुणों की प्रेरणा करनेवाला प्राण संवित्‌ का उद्बोध…
  48. Verse 56हे श्रीरामजी, उस प्रकार वासना और प्राणस्पन्द दोनों चित्त के कारण हैं, उनमें से किसी एक का…
  49. Verses 57–59चित्त का वृक्षरूप से वर्णन कर रहे महाराज वस्रिष्ठजी वासना के क्षय से चित्त विनाश होता है,…
  50. Verses 60–62उसी चित्त का आँधी से उडाये गये धूलि के ढेर के रूप में वर्णन करते हुए, जिस प्रकार पवन के न…
  51. Verse 63अब दूसरे बीज का निर्वचन करते है । हे श्रीरामजी, वासना ओर प्राणस्पन्दन इन दोनों का संवेद्य…
  52. Verse 64हृदय में प्रिय ओर अप्रिय शब्द आदि विषयों का स्मरण करके ही प्राणस्पन्द ओर वासना दोनों आविर…
  53. Verse 65हे भद्र, जिस प्रकार मूल के उच्छेद से वृक्ष तत्काल नष्ट हो जाता है,उस प्रकार संवेद्य का (प…
  54. Verse 66संवित्‌ के साथ अभेद-भावना ही संवेद्य का परित्याग है, ऐसा कहते हैँ । हे राघव, संवित्‌ ही अ…
  55. Verse 67न बाहर ओर न तो भीतर कोई भी संवेद्य संवित्‌ से अलग रहता है, अपने संकल्प से संवित्‌ ही प्रस…
  56. Verse 68जिस तरह स्वप्न मेँ अपना मरण ओर भिन्न देश में स्थिति दोनों अपने चमत्कार के योगसे ही होते ह…
  57. Verse 69हे रघुनन्दन जिस विवेक अवस्था में अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव होता है, वह स्वस्वरूपानु…
  58. Verse 70हे राघव, जैसे बालक को अपने संकल्प से जनित भ्रमसे ही वेताल का उद्भव होता है अथवा जैसे स्था…
  59. Verse 71जैसे खिड़की आदि छिद्रो में से प्रविष्ट चन्द्र या सूर्य की किरणों की दण्डाकारता और उसके भी…
  60. Verse 72श्रीरामजी, यह भ्रान्तिज्ञान मिथ्यारूप है, उसका यथार्थ आत्मज्ञान से उस प्रकार विलय हो जाता…
  61. Verse 73तब यथार्थ ज्ञान किस तरह का है, उसे कहते हैँ । हे श्रीरामजी, ये जो तीन लोक हैं, वे विशुद्ध…
  62. Verse 74उस यथार्थ ज्ञान से जिसका मार्जन करना है, उसे बतलाते हैं। पहले देखा गया या नहीं देखा गया प…
  63. Verse 75उक्त प्रतिभास का मार्जन न करना ही बड़े भारी संसार के साथ आत्मा का संसर्ग करना है और उसका…
  64. Verse 76श्रीरामजी, प्रिय-अप्रिय शब्द आदि विषयों का अनुभव जन्मरूप अनन्त दुःख का हेतु है और चिदेकरस…
  65. Verse 77हे रघुद्रह, इसलिए आप भी शब्द आदि प्रिय- अप्रिय विषयों के दर्शन से विमुख होकर जड़तारहित, ए…
  66. Verse 78श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, एक ही पदार्थ अजड भी और असंवित्तिरूप भी कैसे हो सकता है ? असंवि…
  67. Verse 79महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, संवित्‌-शब्द का एक अर्थ है - बाह्य अर्थो को सत्यरूप से जान…
  68. Verse 80संवित्‌-शब्द का पूर्वोक्त अर्थ बतलाते हुए कथित भाव का ही समर्थन करते है । श्रीरामजी, सत्य…
  69. Verse 81विश्रान्तास्थो न कुत्रचिद्‌” इस अंश का भी अतीत विषयो में तात्पर्य खोलते हुए उसे ही कहते ह…
  70. Verses 82–83उक्त वाक्य का अनागत विषयों में भी तात्पर्य खोलते हुए उसे कहते हैं । वासना वर्जित होने के…
  71. Verse 84शंका का समाधान कर अब प्रकृत विषय का समर्थन कर रहे महात्मा वसिष्ठ जी कहते हैं: समस्त वासना…
  72. Verse 85श्रीरामभद्र, संवेदन से रहित (घटादि आकार वृत्तियों से वर्जित) योगी लोग उसी असीम आनन्द में…
  73. Verse 86इसलिए वह घटादि आकार वृत्तियो का त्याग करनेवाला योगी चलते, बैठते, स्पर्श करते ओर सूँघते इन…
  74. Verse 87हे असीम गुणों के सागर श्रीरामजी, प्राणायाम आदि परिश्रम से साध्य यत्नपूर्वक चेष्टा से इस ज…
  75. Verse 88चिदात्मा स्वयं ही अपने मिथ्याभूत बन्ध और मोक्ष की कल्पना करता है, ऐसा कहते हैँ । जैसे काल…
  76. Verse 89कब किस प्रकार उत्थित हुआ ? उसे कहते है । बार-बार संकल्प करके जब संवित्‌ अपना संकल्पमय स्व…
  77. Verse 90हे राघव, अपने आपसे अपना उत्पादन कर ओर अपने आपसे ही अपने को बार-बार मोहित कर तदनन्तर हृदयस…
  78. Verse 91हे श्रीरामजी, यह संवित्‌ जिसकी भावना करती हे, तत्काल ही तद्रूप हो जाती हे । तब उसी समय सब…
  79. Verses 92–93इसीलिए देव, गन्धर्व आदि स्वरूप भी इसके कल्पित वेष ही है, वास्तव नहीं है, ऐसा कहते हैं। न…
  80. Verse 94जैसे कोशकारकृमि अपने आपको बोधिता हुआ तथा छुडाता हुआ देखा जाता है, वैसे ही प्रकृत आत्मा के…
  81. Verse 95हे श्रीरामजी, संवित्‌-रूपी जलसंतति के द्युलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ, दिशाएँ…
  82. Verse 96हे भद्र, जगत्‌ केवल संविन्मात्रस्वरूप ही हे, उससे पृथक्‌ दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है, इस…
  83. Verse 97कब संवित्‌ को सम्यक्‌ ज्ञान होता है, इस पर कहते हैं। जब संवित्‌ कुछ विषय प्राप्त नहीं करत…
  84. Verse 98पूर्वोक्त प्रणाली से भली प्रकार शोधन करने के अनन्तर परिशेषरूप से अवशिष्ट हुई संवित्‌ अन्त…
  85. Verse 99जो पहले श्लोक में “सन्मात्ररूप ब्रह्मबीज है' ऐसा कहा गया है, वहाँ पर घट, पट आदि में रहनेव…
  86. Verse 100घटादिरूपों के विभाग से जो घटत्व, पटत्व, त्वत्व, मत्व आदि उपाधिभूत सत्ता कही जाती है, वह न…
  87. Verse 101घटत्व, पटत्व आदि उपाधिर्योँ जो अर्थक्रियाओं का भेद होने पर स्वरूपयोग्यतारूप है, वे व्यावह…
  88. Verse 102विशेषांश का परित्याग कर सन्मात्रस्वरूप जो लिप्त न करनेवाला सत्ता का एक रूप स्वरूप हे, वही…
  89. Verse 103व्यावहारिक सत्ता तो वास्तव नहीं है, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामजी, सत्ता का रूप नाना आकार के…
  90. Verse 104समस्त अवस्थाओं में अनुगत सद्रूप तो वैसा नहीं है, ऐसा कहते हैं। सत्ता का जो विमलात्मा एकरू…
  91. Verse 105हे श्रीरामजी, यह कालसत्ता है और यह वस्तुसत्ता है, इस प्रकार की भी विभागकल्पना का परित्याग…
  92. Verse 106हे भद्र, जिस प्रकार अध्यस्त भेद का परित्याग करने पर अधिष्ठान सन्मात्र के परिशेष से समस्त…
  93. Verse 107जहाँ विभिन्न-विभिन्न पदों को देनेवाली विभाग कल्पना नानारूपता का कारण देखी जाती हे, वहाँ व…
  94. Verse 108हे श्रीरामजी, एकमात्र सामान्य सत्तात्मक ही समस्त जगत्‌ है, इस प्रकार की भावना करते हुए आप…
  95. Verse 109हे विज्ञ जनों में श्रेष्ठ श्रीरामजी, सामान्य सत्तामात्र की परम अवधिभूत जो सत्ता है, वही इ…
  96. Verse 110हे श्रीरामभद्र, समस्त सत्ताओं की चरम अवधि मेँ जो कल्पनाओं से निर्मुक्त पद है, वही पद आदि…
  97. Verse 111जिस पद में सद्धर्मता भी लीन हो जाती है और जो निर्विकाररूप से अवस्थित है, उस पद में अपना द…
  98. Verse 112परम पुरुषार्थरूपता बतलाने के लिए उसीकी प्रशंसा करते हैं । वही पद समस्त हेतुओं का हेतु है,…
  99. Verse 113श्रीरामजी, जैसे तालाब मेँ तटस्थ वृक्ष प्रतिबिम्बित होते है, वैसे ही उस प्रत्यक्‌ रूप असीम…
  100. Verse 114उरी प्रत्यक्रूप ब्रह्म मे अध्यस्त होने के कारण ये सब पदार्थ इन्द्रियप्रीति उत्पन्न करते ह…
  101. Verse 115चूँकि अस्वादु पदार्थ भी आनन्दसमुद्र ब्रह्म के संसर्ग से इन्द्रिय-प्रीति उत्पन्न करते हँ,…
  102. Verse 116"आनन्दाद्धयेव खल्विमानि“ (आनन्दात्मा ब्रह्म से ही ये सब भूतपदार्थ उत्पन्न होते हैं, उसीसे…
  103. Verse 117यह भारी है, यह हलका है, इत्यादि वैचित्र्य का वही सामान्यात्मक पद निर्वाहक है, ऐसा से कहते…
  104. Verse 118वह दूरवृत्तियों में अत्यन्त दूरतम, समीप वृत्तियों में अत्यन्त समीपतम, छोटों में अत्यन्त छ…
  105. Verse 119हे प्रिय श्रीरामजी, वह सूर्य आदि तेजों का भी तेज, अन्धकारों का भी अन्धकार, वस्तुओं का भी…
  106. Verse 120वह ब्रह्मात्मक पद लोक में प्रसिद्ध कोई वस्तुरूप नहीं है ओर स्वल्प से भी स्वल्पतर प्रसिद्ध…
  107. Verse 121हे निष्पाप श्रीरामजी, सम्पूर्ण प्रयत्नों से उस परम पावन पद में जिस प्रकार आप स्थित हों, उ…
  108. Verse 122हे श्रीरामजी, उक्त सत्तासामान्यकोटि में (शोधित तत्पदार्थ की चरमावधि में) स्थित वह पद निर्…