Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
चिरमाधिशतोपेताः क्षपयन्ति मृगा इव ।
आत्मतत्त्वं विधिवशात्कदाचित्केचिदेव ते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब जीवन्मुक्त पुरुष व्यवहार क्यो करता है ? इस शंका पर कृतकार्य कुम्हार के वक्रभ्रमण की
नाई वह व्यवहार करता है, ऐसा समाधान देते हैं।
जिस महापुरुष मे पुनर्जन्म की उत्पादक वासना है नहीं, वह चक्र की भ्रमि के सदृश जगत् के
व्यवहार में निरत होता हुआ भी जीवन्मुक्त ओर सत्त्वस्थ है । तात्पर्य यह हे कि जिस प्रकार कुम्हार के
व्यापार के अभाव में भी चक्र का भग्रण तब तक होता रहता है, जब तक कि उसमें संस्कार (वेग) रहता
है, उसी प्रकार अविद्या के क्षीण होने पर भी संस्कार के अवशिष्ट रहने से जीवन्मुक्त शरीर ओर उसका
व्यवहार दोनों प्रारब्ध भोगपर्यन्त विद्यमान रहते हैं