Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 4–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
स्थितिं बध्नासि तत्त्वज्ञ क्षणमप्यक्षयात्मिकाम् ।
क्षणेऽस्मिन्नेव तत्साधु पदमासादयस्यलम् ॥ ४ ॥
सत्तासामान्यरूपे वा करोषि स्थितिमङ्ग चेत् ।
तत्किंचिदधिकेनेह यत्नेनाप्नोषि तत्पदम् ॥ ५ ॥
संवित्तत्त्वे कृतध्यानो यदि तिष्ठसि चानघ ।
तद्यत्नेनाधिकेनोच्चैरासादयसि तत्पदम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, इस प्रकार के जगत्-रूपी महाअरण्य का आक्रमण करके यानी
वासना-प्रतानों (विस्तारों) से चारों ओर संवेष्टन करके जालरचनापूर्वक स्थित हुई जीवसृष्टिरूपी
्राक्षलता, - जिसका विस्तृत आकार है, जरा ओर मरण ही जिसकी पर्व-काण्ड- ग्रन्थियाँ (पोर) हैं,
जिस पर सुख-दुःखरूपी फलों की पंक्तियाँ लगी हैं, माया ही जिसका दृढ़ मूल है, मोह ही जिसकी
सिंचन-साधन जलों की अंजलियाँ है उसका बीज क्या है ? उस बीज का भी बीज क्या है, उस बीज
के बीज के बीज क्या है और तृतीय बीज का भी बीज क्या है