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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 116

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 116 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 116

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

"आनन्दाद्धयेव खल्विमानि“ (आनन्दात्मा ब्रह्म से ही ये सब भूतपदार्थ उत्पन्न होते हैं, उसीसे उत्पन्न होकर उसीसे जीवित रहते हैं और उसी की ओर जाकर उसीमें लीन हो जाते हैं) इत्यादि श्रुति से प्रतिपादित जगत्‌ के जन्म आदि के कारणत्वरूप ब्रह्म-लक्षण का समन्वय भी उसी में है, यह दिखलाते हैं। हे प्रिय श्रीरामजी, उसी आनन्दाब्धि ब्रह्म में सब जगतां के समूह उत्पन्न होते हैं, स्थित रहते हैं, वृद्धिगत होते हैँ, विपरिणाम से युक्त होते हैं, अपक्षयोन्मुख रहते हैं और लीन हो जाते हैं