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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

संवेद्यवर्जितमनुत्तममाद्यमेकं संवित्पदं विकलनं कलयन्महात्मन् । हृद्येव तिष्ठ कलनारहितः क्रियां तु कुर्वन्नकर्तृपदमेत्य शमोदितश्रीः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, केवल एक मात्र घनीभूत वासना ही बलपूर्वक पुनर्जन्म उत्पन्न नहीं करती । उसका भी क्या बीज है” इस चतुर्थ प्रश्न का भी, अनवस्था का परिहार करते हुए, उत्तर देते हैं।ये प्राणस्पन्दन और वासना दोनों, तिलो में तेल की नाई, एक दूसरे के भीतर स्थित हैं और बीजांकुरन्याय से काल की अपेक्षा रखनेवाले क्रम से युक्त होकर एक दूसरे का कारण है