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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 91

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 91 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 91

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, यह संवित्‌ जिसकी भावना करती हे, तत्काल ही तद्रूप हो जाती हे । तब उसी समय सब प्राणियों की संवित्‌ अपने स्वरूप की भावना से अपने स्वरूपभूत मोक्ष को यथेच्छ क्‍यों प्राप्त नहीं होती, तो इस पर कहते हैं । राग आदि की भूमिकाओं से मुक्त नहीं हुई संवित्‌ दीर्घ-काल होने पर भी अपना स्वरूप प्राप्त नहीं कर सकती