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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

यावन्न वासनानाशस्तावत्तत्त्वागमः कुतः । यावन्न तत्त्वसंप्राप्तिर्न तावद्वासनाक्षयः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रतिपादित अर्थ की असंभावना करना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि समस्त जगत्‌ हिरण्यगर्भ का एकमात्र मनोविकाररूप है, यह सब श्रुति ओर पुराणों मे प्रसिद्ध है, यह कहते हैँ । हे श्रीरामजी, सम्पूर्ण उपचारो से परिपूर्ण जो मिथ्या जगत्‌ का स्वरूप दृश्यता को प्राप्त है, वह चित्त से उस प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार मृत्तिका से घट आदि स्वरूप उत्पन्न होते हैं