Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

शरीरनाशदर्शित्वाद्वासना न प्रवर्तते । वासनाविभवे नष्टे न चित्तं संप्रवर्तते ॥ ३० ॥ संशान्ते पवनस्पन्दे यथा पांसुर्नभस्तले । यः प्राणपवनस्पन्दश्चित्तस्पन्दः स एव हि ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी आत्माओ को तो वह संस्कार, किसी प्रकारका विरोध न होने के कारण, तीव्र संवेग और भावना की दृढता के देहादिभाव मेँ भावित कर सकता है, इस आशय से कहते हैं। हे महाबाहो, तीव्र संवेग से आत्मा के द्वारा जिस पदार्थ की भावना की जाती है, तत्काल ही वह महात्मा अन्य संस्मरणं को छोडकर तद्रूप ही हो जाता है