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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

प्रोह्यते प्रपतद्दूरं तृणं गिरिनदीष्विव । कालं यज्ञतपोदानतीर्थदेवार्चनभ्रमैः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

दग्धपट के अवभास से सत्यपटरूपता नहीं कही जा सकती, किन्तु असत्यपटरूपता ही कही जा सकती है, यह तात्पर्य है। हे श्रीरामजी, जिस महामति पुरुष को संस्कार से जनित विषयरसास्वाद के संस्मरण से विषयानुरक्ति उत्पन्न नहीं होती, उस महामति पुरुष का चित्त अचित्तरूपता को तथा विशुद्ध सत्व को यानी पटभस्म की नाई अवशिष्ट अधिष्ठानभूत सत्ता को प्राप्त हुआ है, ऐसा कहा जाता हे