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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एतानि तानि प्रोक्तानि त्वया बीजानि मानद । कतमस्य प्रयोगेण शीघ्रं तत्प्राप्यते पदम् ॥ १ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । एतेषां दुःखबीजानां प्रोक्तं यद्यन्मयोत्तरम् । तस्य तस्य प्रयोगेण शीघ्रमासाद्यते पदम् ॥ २ ॥ सत्तासामान्यकोटिस्थे द्रागित्येव पदे यदि । पौरुषेण प्रयत्नेन बलात्संत्यज्य वासनाम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

नब्बेवाँ सर्गे समाप्त इक्यानवेवों सर्ग संसाररूपी लता का कारण शरीर है, शरीर का कारण मन है तथा मन के कारण प्राण स्पन्द और वासना ये दो हैं, यह वर्णन । परह्य में अध्यस्त वौहद भुवन-स्वरूप जगत्‌ में विस्तृतरूप से फैली हुई जीव सृष्टिरूपी लता के बीजों की परम्परा की सीमा कहाँ तक है ? इसको मूल का उच्छेद करने मे उपाय जानने की अभिलाषा से पूछने की इच्छावाले श्रीरामजी पहले जगत्‌ का वन के रूप में वर्णन करते है । श्रीरामजी ने कहा : महाराज, (यह जगत्‌ एक तरह का बड़ा भारी वन है, वहाँ पर) निर्विशेष पर ब्रह्म का साक्षात्कार करने में पर्वत की नाई प्रतिबन्धक होने से पर्वत तुल्य अव्याकृत में उत्पन्न चित्रविचित्र पृथक्‌ पृथक्‌ ब्रह्माण्ड ही वृक्ष हैं, उन वृक्षों पर तारागण ही फूल लगे हैं, देवता और असुर पक्षी हे । विद्युत्‌-रूपी मंजरियों से समन्वित दिशारूपी शाखाओं के अग्रभागों में नील आदि वर्णवाले मेघ ही पल्लव हैं । वह सब ऋतुओं में सुन्दर चन्द्रमा और सूर्यरूपी विकास-रमणीय पुष्पों से उन्‍नत दाँत से युक्त होकर हँसता हुआ-सा स्थित है, सात समुद्ररूपी बावड़ियों से वेष्टित है, सैकड़ों नदियों से मनोहर है, लोकभेद से चौदह प्रकार के और व्यक्तिश: असंख्य भूतगणों से उपजीवित है यानी उनके जीवन का साधन है