Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
एकैकशो निषेव्यन्ते यद्येते चिरमप्यलम् ।
तन्न सिद्धिं प्रयच्छन्ति मन्त्राः संकीलिता इव ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
समष्टि प्राणस्पन्दन के
विषय में उपरत उस चिति की शान्ति यानी निष्क्रियता ही शान्ति अर्थात् जगत्-प्रलय या मोक्ष कहा
जाता है, प्राण के स्पन्दन से संवित् करतल से विताड़ित गेंद की नाई, ऊपर नीचे होती रहती है