Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 115
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 115 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 115
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
चूँकि अस्वादु पदार्थ भी
आनन्दसमुद्र ब्रह्म के संसर्ग से इन्द्रिय-प्रीति उत्पन्न करते हँ, इसलिए वह चिदाकाश का पद यानी
स्वरूप स्वादु और प्रिय पदार्थो के बीच में सबसे बढ़ चढ़ कर आनन्दरूप ओर प्रियतम है